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साइबर अपराध: निर्णायक प्रहार का वक्त, क्योंकि इंतजार से आंकड़े ही बढ़ेंगे

विराग गुप्ता
Updated Mon, 19 Jan 2026 07:23 AM IST

सार

कानूनी एजेंसियों के नाम पर डिजिटल अरेस्ट करके ठगी करने के मामले आए दिन बढ़ते जा रहे हैं, जिसकी तस्दीक न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, बल्कि एनसीआरबी व गृह मंत्रालय के आंकड़े भी करते हैं। अब समय आ गया है कि साइबर अपराध और डिजिटल अरेस्ट की जड़ों पर प्रहार हो।
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डिजिटल अरेस्ट - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


पिछले साल दिल्ली में 73 साल के सेवानिवृत्त बैंक कर्मी को डिजिटल अरेस्ट करके 23 करोड़ रुपये की साइबर ठगी हुई थी। उसके बाद अमेरिका से भारत वापस आई 77 साल की महिला डॉक्टर के साथ 14.85 करोड़ रुपये की और अब नए साल में 70 साल की बुजुर्ग महिला को डिजिटल अरेस्ट करके सात करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी हुई है। ठगी के 22 करोड़ रुपये के इन दो मामलों में अभी तक 4.89 करोड़ रुपये ही जब्त हो सके हैं। शुरुआती जांच के अनुसार, सिर्फ इन दो मामलों में ही छह से सात चरणों में फैले 5,500 म्यूल, यानी फर्जी खातों, के माध्यम से पैसा अपराधियों तक गया है।


कानून से डरने वाले पढ़े-लिखे बुजुर्ग और सेवानिवृत्त लोग डिजिटल अरेस्ट का ज्यादा शिकार हो रहे हैं। अधिकांश मामलों में बुजुर्गों के बैंक खातों में बड़ी रकम होती है। कई मामलों में मोबाइल में लोन देने वाले एप्स को डाउनलोड करवाकर पैसों का जुगाड़ करने के भी मामले सामने आए हैं। डिजिटल अरेस्ट में पुलिस और कोर्ट के नाम पर धमकाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल डिजिटल अरेस्ट के मामलों का स्वतः संज्ञान लिया था। उस मामले में एक दिसंबर को जारी आदेश के अनुसार, साइबर ठगी के सभी तरह के मामलों का प्रकोप बढ़ रहा है। इसलिए, डिजिटल इंडिया में अपराध के नए आयाम से जुड़े सभी पहलुओं को एकजुट नजरिये से देखने की जरूरत है।


डिजिटल अरेस्ट की सबसे बड़ी वजह लोगों के डाटा का खुले बाजार में कौड़ियों के भाव बिकना है। जब मोबाइल नंबर, आधार, इंटरनेट सर्च और बैंक खातों से जुड़ी जानकारी अपराधियों के पास होती है, तो पुलिस, सीबीआई या जज बनकर लोगों को डराना बहुत आसान हो जाता है। इसे दुरुस्त करने के लिए संसद से साल 2023 में पारित डाटा सुरक्षा कानून को तुरंत लागू करने की जरूरत है।


भारत के किसी भी कानून में डिजिटल अरेस्ट का प्रावधान नहीं है। वीडियो कॉल से पूछताछ, जांच या गिरफ्तारी का वारंट देने का भी कोई नियम नहीं है। उसके बावजूद, ठग पुलिस, सीबीआई, ईडी, कस्टम, इनकम टैक्स या नारकोटिक्स अधिकारी की यूनिफॉर्म पहनकर लोगों को वीडियो कॉल करते हैं। नकली सरकारी आईडी कार्ड से लैस ठग डराने के लिए बैंकग्राउंड में पुलिस स्टेशन या अदालत जैसे दिखने वाले स्टूडियो का इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल अरेस्ट में पार्सल या कूरियर में ड्रग्स, बैंक खाते में गलत ट्रांजेक्शन, मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप जैसे ठगी के तरीके ज्यादा प्रचलित हैं। सरकारी रोब दिखाकर पीड़ित व्यक्ति को मानसिक तौर पर तोड़ने और डराने के लिए डिजिटल गिरफ्तारी का पूरा स्वांग रचा जाता है। ई-मेल और कॉल के जरिये गतिविधियों को ट्रैक करने वाले सॉफ्टवेयर को मोबाइल फोन में इंस्टॉल करवाकर बुजुर्ग और महिलाओं को आतंकित करने के मामले भी आए हैं।


ठग अंतरराष्ट्रीय कॉल करने के लिए अवैध सिम बॉक्स का उपयोग करते हैं। इससे विदेश से आने वाली कॉल पीड़ित के फोन पर भारतीय नंबर के रूप में दिखाई देती है। सरकारी खाते बता कर जिन खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए गए, वे जनधन या किराये में लिए गए गरीब लोगों के बैंक खाते होते हैं। कई राज्यों में फैले अपराधियों के नेटवर्क के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई में विलंब का फायदा उठाकर साइबर ठगी की रकम क्रिप्टो करेंसी, गेमिंग एप या हवाला के जरिये कंबोडिया, वियतनाम और लाओस जैसे देशों में बैठे साइबर अपराधियों के पास ट्रांसफर हो रही है। इस मर्ज को ठीक करने के लिए फर्जी सिम कार्ड और बोगस बैंक खातों के लिए टेलीकॉम कंपनियां, यूपीआई प्लेटफॉर्म और बैंकों की आपराधिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। साथ ही, आईटी नियमों के तहत शिकायत और अनुपालन (कंप्लायंस) अधिकारियों का विवरण सार्वजनिक नहीं करने वाली एक्स और ग्रोक जैसी तकनीकी कंपनियों की सेफ हार्बर की कानूनी सुरक्षा खत्म होनी चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्र सरकार ने इस मामले में वित्त, गृह, विदेश, आईटी मंत्रालय, सीबीआई तथा रिजर्व बैंक के अधिकारियों वाली एक उच्चस्तरीय समिति का गठन करके निर्णायक प्रहार का संकल्प लिया है, लेकिन साइबर अपराधों की प्राथमिकी राज्य पुलिस थानों में दर्ज होती है। इसलिए, इस समिति को सफल बनाने के लिए राज्य सरकारों का प्रतिनिधित्व जरूरी है। दिल्ली की जिला अदालत ने ठगी के मामले में अग्रिम जमानत देने से मना करने के साथ ही कहा है कि साइबर अपराधों की बाढ़ से सामाजिक और आर्थिक संरचना को बुरी तरह से नुकसान पहुंच रहा है।
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आरबीआई के 2017 के नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के नए फैसले के अनुसार ठगी की रकम 10 दिन में बैंक को लौटानी चाहिए, ताकि पीड़ितों को अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें। गृह मंत्रालय की नई एसओपी के अनुसार, 50 हजार रुपये से कम की ठगी के मामलों में अदालत के आदेश के बगैर ही रिफंड दिया जा सकता है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2021 से 2023 के बीच लगभग 2.05 लाख साइबर अपराध के मामलों में एफआईआर दर्ज हुई, जबकि केंद्रीय गृह मंत्रालय की हेल्पलाइन में 2022 से 2024 के दौरान लगभग 48.93 लाख मामले दर्ज किए गए। गृह मंत्रालय के आईफोरसी के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले छह साल में भारतीयों के 52,976 करोड़ रुपये साइबर अपराध में ठगे गए हैं।


हकीकत यह है कि करोड़ों लोगों के साथ खरबों रुपयों की साइबर धोखाधड़ी हो रही है, पर ऐसे अनेक मामलों में एफआईआर तक दर्ज नहीं हो पाती। ऐसे में, असली अपराधी पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहते हैं। नए आपराधिक कानूनों के अनुसार साइबर अपराध से जुड़े सभी मामलों में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। इससे समस्या की विकरालता का पता चलने के साथ ठगी के मामलों को रोकने और लोगों को रकम वापसी के प्रयास तेज हो सकेंगे। edit@amarujala.com
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