वह शेयर सूचकांक की तरह गिरा मुंह लिए दरवाजे पर बैठे थे और बेमन से दातुन को दांतों से रगड़ रहे थे। मैंने कहा, नीम की दातुन कड़वी लगती है, तो बबूल घिसा करो। यों बेमन से दातुन रगड़ने से दांत नहीं चमकते भाई।
उन्होंने नजरों को डॉलर के मुकाबले कभी-कभार क्षीण से उठने वाले रुपये की तरह हौले से उठाया, काहे की चमक भाई! अपनी तो किस्मत ही किसी भोथरी कलम से लिखी गई है, जो एक बार फिर चमकते-चमकते रह गई।
अरे, सुबह-सुबह ताजगी का आलम है, प्राणवायु प्रवाहमान है, और तुम मर्सिया गुनगुना रहे हो?
वह एकदम से चिहुंके, जब तीन लाख का नुकसान हो जाए, तो मर्सिया ही फूटता है।
ओह, क्या कहीं शेयर में पैसे फंसा रखे थे या चिटफंड के चक्कर में लुटवा बैठे? मैंने उत्सुकतावश पूछा, तो उन्होंने मुझे संदिग्ध-सी नजरों से देखा, जैसे कोई जान-बूझकर अनजान बनने वाले को रंगे हाथों पकड़ रहा हो। फिर बोले, तुमने सुना नहीं, उस दिन प्रधानमंत्री ने क्या कहा?
हां, सुनी है न उनके मन की बात, उन्होंने फिर इरादा जाहिर किया है कि काले धन की पाई-पाई लाकर रहेंगे।
लगता है तुमने मन की बात सुनी, पर मन की बात पकड़ी नहीं। उन्होंने काले धन के आंकड़े को लेकर अनभिज्ञता जताई है कि यह एक रुपया भी हो सकता है, हजार भी, करोड़ भी और अरब भी!
उन्हें सच में नहीं मालूम होगा। झूठ क्यों बोलेंगे प्रधानमंत्री?
लेकिन चुनाव से पहले तो वह कहते थे कि विदेशों में इतना काला धन पड़ा है कि हरेक भारतीय के हिस्से में तीन लाख रुपये आएंगे। हमने खाता खुलवाकर उसमें बड़ी उम्मीदें डिपॉजिट की थी, पर लुट गई सारी उम्मीदें। उन्हें तब इतना ऊंचा फेंकने की क्या जरूरत थी?
कोई बात नहीं बंधु, राजनीति और नेताओं के आश्वासनों पर खुलने वाले उम्मीदों के अकाउंट ऐसा ही रिटर्न देते हैं। इनसे निपटने के लिए किसी तपस्वी सी तटस्थता, निर्लिप्तता चाहिए। कहकर मैं आगे बढ़ गया। वह पुन: दातुन रगड़ने लगे।