दलितों के अपमान और रहनुमाई को लेकर जो हो रहा है, वह निंदनीय है। सही तो यह है कि आजादी के बाद से अभी तक दलितों का जितना उत्थान हुआ, मूलत: आरक्षण की वजह से ही हुआ है। उनके नाम पर सियासत करने वाले नेता आलीशान प्रासादों में सुख भोग रहे हैं। सोचने की बात है कि आरक्षण की व्यवस्था नहीं होती, तो दलित समुदाय का क्या हश्र होता? देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए पार्टियां दलित-पिछड़ों-सवर्णों और मुस्लिम वोटों के लिए रणनीति बना रही हैं। लेकिन इस वक्ती जोड़-तोड़ से इतर समाज की अंतर्धारा की दिशा क्या है, रोजमर्रा की जिंदगी इस बारे में हमें बहुत कुछ सिखाती है।
कुछ समय पहले वर्षों बाद गांव जाना हुआ। चर्चा के दौरान बचपन का एक दोस्त तैश में आकर ब्रजभाषा में बोला- ‘मैंने बाय (उसको) जब खरी-खरी सुनाई, तौ बाकी (उसकी) आंख निकरि आईं अंबेडकर की सी।’ उसी वार्तालाप में एक जगह जिक्र आया ‘मोय उंगरिया मत दिखावै अंबेडकर की सी।’ दोनों वाक्य चौंकाने वाले थे। साफ था कि मन का भाव प्रकट करने के लिए अंबेडकर की प्रतिमा की भंगिमा का इस्तेमाल किया गया।
सवाल है कि कहीं ये अभिव्यक्तियां सामंती सवर्ण मानसिकता की प्रतीक तो नहीं थीं? इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन जितना मैं समझता हूं, ऐसा नहीं था। दोनों गंवई मुहावरे जिस रूप में ग्रहण और इस्तेमाल किए गए, उसमें किसी वाद का विरोध या राजनीतिक आग्रह, पूर्वाग्रह या दुराग्रह या अंबेडकर के अपमान का इरादा नहीं था। सवाल है कि किसी महापुरुष की प्रतिमाएं गांव-गांव, शहर-शहर में लगाना ही क्या उनकी विचारधारा की स्थापना के लिए काफी है? यह विडंबना ही है कि किसी महापुरुष की प्रतिमा उनके विचारों या व्यक्तित्व की सतत मौजूदगी के बजाय ‘अवाक होने’ और ‘हेकड़ी नहीं दिखाने’ का भाव जताने के लिए इस्तेमाल में आने लगे।
साफ है कि प्रतिमाओं से ही काम नहीं चलेगा। सामाजिक विकास, समरसता, सत्य, अहिंसा, भेदभाव नहीं करने जैसे मूल्यों की स्थापना के लिए महापुरुषों की शिक्षाओं के प्रसार-प्रचार के लिए काम करना होगा। बुनियादी समस्याओं के हल के लिए जमीन पर काम करना पड़ेगा। सोचना पड़ेगा कि लोगों के लिए एक और भगवान गढ़कर उनके नियतिवाद को और पुख्ता करना है या उनमें नए जमाने के नए विचारों के हवादार झरोखों तक पहुंचकर सांस लेने का आत्मविश्वास जगाना है?
अंबेडकर की 125वीं जयंती के मौके पर देश भर में सरकारी-गैर-सरकारी स्तर पर काफी विमर्श हुआ है। करीब-करीब सभी सियासी पार्टियां अंबेडकरमय हैं। इस मौके पर फिर से वही सवाल पूछे-बताए जा रहे हैं कि क्या अंबेडकर महज दलितों के ही मसीहा थे? उनकी यह छवि किसने और क्यों बनाई?
इस सवालों के जवाब कुछ भी हों, दलित समुदाय को वोट बनाकर सियासत करने वाली पार्टियों ने ढोल पीट-पीटकर अंबेडकर को दलित समुदाय से ही चिपकाने की कोशिश की। दलित वोटों के सहारे सत्ता में आने पर उन्होंने खुद को ही अंबेडकर के बराबर घोषित कर डाला। लेकिन अब वक्त है कि अंबेडकर को सही मायने में समझा-समझाया जाए।
देश को प्रतिमाओं से कहीं ज्यादा, नए प्रतिमानों और विचारों की जरूरत है। बहुत जरूरी है कि अंबेडकर के विचारों को ग्रंथों, सेमिनारों, स्मारिकाओं, संग्रहालयों से निकाल कर आखिरी आदमी तक पहुंचाया जाए।