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अपने लिए जगह तलाशते झांकते से वे हसीन दिन

Sat, 02 Mar 2013 11:15 PM IST
कैलाश वाजपेयी
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सर्ग दत्त ने `अस्पताल' शब्द क्या बोला, सुधाकर जी हमारी दुर्बल काया को लेकर चिंतित हो गए। कुछ देर तक यहां-वहां की बातें करने के बाद हमें सुझाव दिया कि मुंबई के फोर्ट इलाके में उनके मित्र वैद्यराज शिव शर्मा का औषधालय है। काव्योत्सव वाली शाम वे भी कविता सुनने आए थे। हमें हैरानी इस बात की थी कि सुधाकर जी हमारे स्वास्थ्य को लेकर इतने चिंतित क्यों हैं? कालांतर में हमें पता चला कि शायद उन्हें एक योग्य वर की तलाश थी।
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वे शायद इस तथ्य से अवगत थे कि हमने नितांत विषाक्त मनःस्थिति में लखनऊ छोड़ा था। भावनात्मक लगाव के तल पर हमें आघात पहुंचा था। इतना कि हमें सारा दिग्विषय एक अशमनीय अग्निकांड लगता था और सुधाकर जी अनजाने ही अपनी सदाशयता के बहाने इस धू -धू जलते हुए जंगल में ओस की तलाश कर रहे थे। उनकी जिद का आदर करते हुए हम वैद्यराज शिव शर्मा के यहां गए।

शिव शर्मा की आयु का अंदाज लगाना कठिन था। उनका मुखमंडल हीरे की तरह दमक रहा था। उनका वेश नितांत आधुनिक। मीठी वाणी में उन्होंने कहा, `आओ कैलाश। उस शाम तुम्हारी रचना सुनकर मेरे जैसा प्रसन्नमना प्राणी भी विचलित हो गया। दुनिया में वैसे ही दुख क्या कम हैं! फिर नैराश्यपूर्ण रचना क्यों?' हम समझ नहीं पा रहे थे कि वैद्यराज कहना क्या चाह रहे हैं। नाड़ी परखने से पहले शिव शर्मा ने हमारी राम कहानी जाननी चाही। यह कि हमारे परिवार में कौन-कौन है?
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हमने लखनऊ के दिनों में क्या-क्या पढ़ा, कितने उपद्रव किए? कहीं कोई स्नेह संबंध भी हुआ क्या? आदि-आदि। मगर असली भेद हमने नहीं खोला, तो नहीं खोला। शिव शर्मा ने हाथ की नाड़ी पर कुछ देर ध्यान कर कहा, `तुम अवसाद के दौर से गुजर रहे हो। लेकिन मेरे पास दवा है। ऐसी दवा जिसे नागार्जुन ने खोजा था।' नागार्जुन का नाम आते ही हमने अचकचाकर कहा, `नागार्जुन तो `शून्यवाद' का प्रणेता बौद्ध दार्शनिक था, जिसने शायद कहा था -यहां न सद् है न असद्।

शिव शर्मा अभी हमें प्रश्नसूचक सी मुद्रा बनाए देख रहे थे, अब बोले, `आप शायद उस `मांडूक्य कारिका' की याद कर रहे हैं, जो कहती है, `स्व तो वा पर तो वापि न किंचिद वस्तु जायते।' मगर नागार्जुन तो इससे भी आगे चला जाता है। इससे आगे हम और कुछ बोलते, हमें बीच में ही रोककर शर्मा जी गीता का `नासतो विद्यते भावो' श्लोक बोल उठे। बाद में वैद्यराज ने अपने बाएं ओर की अलमारी से एक बड़ी सी शीशी निकालते हुए (शीशी पर कुछ लिखा नहीं था) रसायन विशेषज्ञ द्वारा रचित `अष्टांग हृदय' की सहायता से बनाई गई कोई दवा हमें दी।

शिव शर्मा ने बिना प्रतिरोध किए यह भी कहा, `दर्शन तो मैंने पढ़ा नहीं, मगर जिस रसायनशास्त्री नागार्जुन द्वारा प्रणीत विद्या का अध्ययन मैंने किया है, वे नागार्जुन ईसा की आठवीं शताब्दी के आसपास आंध्र में हुए थे। तब वहां शतवाहनों का राज्य था। नागार्जुन रसबंध या पारा, तांबा आदि धातुओं को बांधने की विधि जानते थे। ऐसा करने के लिए नागार्जुन ने तत्कालीन नरेश यज्ञश्री से एक हजार एकड़ जमीन मांगी थी।

इसके बाद सत्ताइस नक्षत्रों में कब किस नक्षत्र की बेला में कौन सी औषधि का बीजारोपण करना है, यह विद्या भी शायद नागार्जुन को ही ज्ञात थी। अपनी रसायन विद्या को चरितार्थ करने के लिए नागार्जुन, चंद्रमा की कलाओं की गणना कर जड़ी विशेष के पौधे से रात में नमस्कार कर यह प्रार्थना लेकर जाते थे कि अगले दिन वे उस पौधे की कुछ पत्तियां , रोग विशेष के उपचारार्थ तोड़ने आएंगे। इसके लिए उन्हें क्षमा किया जाए।
 
शिव शर्मा ने दोहराया, `बेल के वृक्ष से ताजे फल के धरती पर गिरने के तत्काल बाद उसकी नाभि में एक सूराख करके उसमें कच्चा पारा निसृत कर उसे श्यामा गाय के गोबर से बने उपलों की धीमी आंच में सारी रात पकने देने के ही साथ आदि शंकर द्वारा प्रणीत कादि हादि विद्या के श्लोकों का सारी रात जप करने का प्रभाव यह होता है कि पारा सोना बन जाता है, हमने शालीनतावश दवा की वे पुड़िया ले लीं। मगर थोड़े अंतराल बाद मैरीन लाइंस स्थित अस्पताल में हमें फिर भर्ती होना पड़ा।
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