बस कुछ दिन और चढ़ा रहेगा चुनावी बुखार। 543 ‘अनार’ दस-गुना बीमार। वोट पड़े नहीं कि आए बहार बन के लुभा कर चले गए... विलापेंगे मतदाता। खबर है कि अबकी बार मतदान का प्रतिशत बढ़ा है। पार्टियां भी तो बढ़ी हैं। कभी गिनी-चुनी पार्टियां होती थीं। पार्टी में पार्टी-शन की शुरुआत तब हुई, जब देश की सबसे पुरानी पार्टी में अहम का पर्याय ‘आई’ कोष्ठक में बैठकर हावी हो गया। आबादी सिर्फ जन की ही नहीं जन(ता) के नाम के दल की भी बढी है। बेमिसाल ‘वर्ण’ व्यवस्था, पहले ‘यू’ फिर ‘बी’। कालांतर में ‘आर’ और ‘एल’ भी ब्रैकेट में समा गए। जनता (की) पार्टी जपा में ‘भा’ संयुक्त हुआ, तो सपा के विद्रोहियों ने ‘ब’ को बगल बैठाकर बहुजन के प्रति आस्था प्रकट की। आम आदमी जब किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ, तब उसके नाम की पार्टी अवतरित हो गई।
विषय पर आता हूं। चुनाव भी कई प्रकार के होते हैं। यह पहली कैटगरी वाला आम चुनाव है। हिंदी से परहेज करने वालों के लिए जनरल इलेक्शन। इसकी दूसरी किस्म मध्यावधि, संसद अथवा विधान सभा की अकाल समाप्ति पर उपजती है। और तीसरा स्वरूप है उप-चुनाव, जो सांसद अथवा विधायक की अकाल मृत्यु या अन्य किसी वजह से कुर्सी खाली होने पर उदित होता है।
आम-चुनाव के इस दरिया में मतदाता रूपी मछली को फंसाने के लिए ढेरों बंसियां लटकी हैं। कोई हाथ की शक्ति की दुहाई दे रहा है, तो कोई साठ महीनों की सेवा हेतु फुल-पेज विज्ञापन में याचक मुद्रा में है। एक विशेष संप्रदाय को खुश करने के लिए मुगले-‘आजम’ भी प्रकट हो चुके हैं।
एक मत और ढेरों कटोरे। आखिर किसे ‘दान’ दिया जाए। कंफुजियाया हुआ है वोटर। सियासी महारथियों के ‘काज’ सिद्ध करने साथ ही वोटिंग का परसेंटेज बढाने के लिए उसे ‘बटन’ दबाना ही है। यानी कचरे में से हीरा खोजना है। लेकिन, सावधान! सत्ता मिलने पर यही हीरा कचरा न साबित हो जाए। होश और जोश के चलते कालांतर में बुदबुदाना न पड़े- लागा उंगली में दाग...