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इस बार असली परीक्षा तो बनारस की होगी

Sun, 23 Mar 2014 04:21 AM IST
कुमार प्रशांत
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बच्चों का एक खेल होता है, जिसे बड़े-बुजुर्ग भी बड़े हौसले से खेलते हैं-म्यूजिकल चेयर! हिंदी में इसका नाम रखना हो, तो मैं रखूंगा-गाने में धोखा! गोल-गोल घूमते रहो, जो गीत बज रहा है, उसे मत सुनो; सुनो तो बस इतना कि गाना बंद कब होता है; और जहां गाना बंद हुआ, सामने पड़ी कुर्सी पर टूट पड़ो। कुर्सी हथियाने में किसी को धक्का मारकर गिराना पड़े, तो उससे भी परहेज नहीं। भारतीय जनता पार्टी में, इन दिनों यही खेल बड़ी क्रूरता से खेला जा रहा है।
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लालकृष्ण आडवाणी हैं, जिनके नाम से कभी पार्टी में पत्ते भी कांपते थे; और जो इस मुगालते में रहते हैं कि आज भी ऐसा ही है; लेकिन वह देख नहीं पा रहे हैं कि आज वह स्वयं पत्ते की तरह कांप रहे हैं।

टिकटों के बंटवारे का ऐसा बेदर्द खेल सभी पार्टियों में जारी है। फर्क इतना ही है कि भाजपा में यह एक व्यक्ति की निरंकुश सत्ता स्थापित करने के लिए योजनापूर्वक किया जा रहा है। और इसी रणनीति के तहत नरेंद्र मोदी दो-दो जगहों से चुनाव लड़ रहे हैं। रणनीति एकदम सीधी है-जैसा ध्रुवीकरण करके मोदी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, उसका सबसे मुफीद केंद्र बनारस बनता है।
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80 संसदीय सीटों वाले उत्तर प्रदेश की 32 सीटें बनारस समेत इसी पूर्वी क्षेत्र से आती हैं। भाजपा का गणित यह भी है कि इसका सीधा असर बिहार के उन हिस्सों पर पड़ेगा, जिनसे बनारस का रोटी-बेटी का रिश्ता है। संघ परिवार इस आधारहीन विश्वास से चिपका रहता ही है कि हिंदू आस्थाओं में आस्था रखने वाले, उसकी सोच में भी आस्था रखते हैं। हिंदू आस्था में जिन 12 ज्योतिर्लिंगों की कल्पना की गई है, उनमें से एक गुजरात के सोमनाथ में, तो दूसरा बनारस के विश्वनाथ में है।

संघ मानकर चल रहा है कि इसे चुनाव का मंत्र बनाया जा सकता है-नरेंद्र मोदी यानी ‘सोमनाथ से विश्वनाथ’ की जय यात्रा। पर बनारस सांप्रदायिक राजनीति का गढ़ कभी नहीं रहा है, हालांकि भोले बाबा को अपना सहजातीय मानने वाले हिंदुत्ववादियों ने इसे अपनी नगरी घोषित कर रखा है। पर बनारस आधुनिक सोच व गहरी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। साम्यवाद से लेकर समाजवाद तक को यहां से दाना-पानी मिलता रहा है।

1991 में भाजपा ने यहां पहला चुनाव जीता। तब से 1999 के बीच हुए तीन अस्त-व्यस्त आम चुनावों में भाजपा की लगातार जीत हुई है। फिर कांग्रेस ने उसे परास्त किया, जिसे 2009 में मुरलीमनोहर जोशी ने परास्त किया। यहां के करीब आठ लाख मतदाताओं में दो लाख से ज्यादा मुसलमान हैं। सांप्रदायिक सोच से असहमति रखने वालों की मुखर व सक्रिय उपस्थिति है यहां।

बाबा विश्वनाथ की छाया में सांस लेती ज्ञानवापी मस्जिद बनारस का एक चेहरा गढ़ती है। बिसमिल्लाह खान साहब की शहनाई और शास्त्रीय गायन की गहनता से जिस नगरी की सुबह-शाम जुड़ती है, गोदई महाराज के तबले की थाप से जो जागती है और पता नहीं कितने ज्ञानी-गुणी साधकों से जिसकी गलियां पटी हुई हैं, उस बनारस को सांप्रदायिक रंग में रंग देना किसी के बस का नहीं है।

इसलिए तो कहा है किसी ने-बना रहे बनारस! पर इसका मतलब यह तो नहीं ही है कि संघ परिवार को यह हक नहीं है कि वह अपना गणित लगा कर, यहां से कोई उम्मीदवार खड़ा न करे-इस बार वह उम्मीदवार मोदी हैं, कल को कोई दूसरा होगा! लेकिन परीक्षा तो बनारस की होगी।

यदि वह फैसला करता है कि वह मुल्क की जिस गंगा-जमुनी संस्कृति का ध्वजवाहक है, उसका बेहतर प्रतिनिधित्व व संरक्षण मोदी करते हैं, तो वह जरूर उन्हें चुनेगा। अगर उसे लगता है कि वह कहीं से भी बनारस के नाप के नहीं हैं, तो उसे दूसरे विकल्पों पर विचार करना होगा। अभी दूसरे खिलाड़ी भी मैदान में आएंगे, पर असली परीक्षा तो बनारस की है। वह बना रहेगा कि नहीं?
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