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असहज करेगी यह खामोशी

Sun, 08 Jun 2014 07:21 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
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देश में हर साल लगभग पैंतीस हजार लोगों की हत्या होती है। वर्ष 1953 से, उसी साल से सालाना आंकड़ा उपलब्ध है, अब तक हत्याओं में 251 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जनसंख्या वृद्धि की तुलना में अपराध बढ़ने की गति बहुत अधिक है। नतीजतन सरकारों की जिम्मेदारी भी बहुत बढ़ गई है। इसी कारण कोई उम्मीद भी नहीं करता कि हत्या के किसी खास मामले की जानकारी प्रधानमंत्री को होगी। प्रधानमंत्री को तो छोड़िए, गृह मंत्री या उनके कनिष्ठ सहयोगी से भी हर हत्या की जानकारी रखने की उम्मीद कोई नहीं करता। लेकिन कोई घटना केवल इस आधार पर साधारण नहीं हो सकती कि हत्या सिर्फ एक आदमी की हुई है। पुणे में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर मोहसिन सादिक शेख की हत्या इसी श्रेणी में आती है।
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इस मामले के कुछ तथ्य ऐसे हैं, जिनके बारे में अंतिम निष्कर्ष आना अभी शेष है। जैसे, उनकी हत्या किसने और क्यों की? लेकिन इस हत्या के कुछ पहलू ऐसे हैं, जिनके बारे में पता है। जैसे, मोहसिन एक मुस्लिम था, अपने परिवार का अकेला कमाऊ सदस्य था और शोलापुर से पुणे आया था। वह अपने हिंदू नियोक्ता का विश्वस्त कर्मचारी भी था। एक समानांतर कथा भी है, जो स्तब्ध करने वाली है। पिछले सप्ताह छत्रपति शिवाजी, बाला साहब ठाकरे और हिंदू देवी-देवताओं की कुछ बेहद आपत्तिजनक तस्वीरें फेसबुक पर दिखीं। ये तस्वीरें किसी की भी भावना को ठेस पहुंचाने के लिए काफी थीं। अभी यह साबित नहीं हुआ है कि देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने वाली ये तस्वीरें फेसबुक पर मोहसिन ने ही डाली थीं। पर एक समूह ने, जिसे हिंदू राष्ट्र सेना का सदस्य बताया जाता है, मान लिया कि फेसबुक पर वे आपत्तिजनक पोस्ट शेख ने डाले थे, लिहाजा पीट-पीटकर उसकी हत्या कर दी। इस सिलसिले में कई लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं, हालांकि हिंदू राष्ट्र सेना के मुखिया धनंजय देसाई इस हत्याकांड में अपने संगठन की लिप्तता की बात खारिज करते हैं। पुणे से नवनिर्वाचित भाजपा सांसद अनिल शिरोले की टिप्पणी इस संदर्भ में गौरतलब है, 'फेसबुक पर जो तस्वीरें दिखीं, वे भावनाओं को आहत करने वाली थीं। इसकी कुछ प्रतिक्रिया होनी तो स्वाभाविक थी।' हालांकि बाद में उन्होंने अपनी इस टिप्पणी से कन्नी काटते हुए कहा कि उनकी बात को गलत तरीके से समझ लिया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घटनाओं पर तत्काल प्रतिक्रिया जताते हैं और वह एक फरवरी, 2009 से ट्वीटर का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह असंभव है कि वह इस हत्या के बारे में न जानते हों। पर इस मुद्दे पर उन्होंने चुप्पी बरती है। देसाई और उनकी हिंदू राष्ट्र सेना भाजपा या संघ का हिस्सा नहीं हैं। देसाई को उन प्रमोद मुतालिक की तरह माना जा सकता है, जिन्होंने कुछ साल पहले मंगलौर में पब जाने वाली कुछ लड़कियों पर हुए हमले का नेतृत्व किया था। लोकसभा चुनाव से पहले राज्य भाजपा ने प्रमोद मुतालिक को पार्टी में शामिल कर लिया था। लेकिन जब यह महसूस हुआ कि उन्हें पार्टी में लाने से उदार सोच वाले समर्थकों का एक हिस्सा छिटक सकता है, तो अविलंब मुतालिक को बाहर कर दिया गया। उसके कुछ समय बाद, चुनाव अभियान के दौरान भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने एक उकसाऊ टिप्पणी की थी कि नरेंद्र मोदी का विरोध करने वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए। उसी समय विहिप के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने हिंदू इलाकों में मकान खरीदने वाले मुस्लिमों को निशाना बनाया। तब नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर ऐसे बयानों के प्रति असहमति जताते हुए इन्हें गैरजिम्मेदार बताया।
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सवाल यह है कि जब चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ऐसे विचारों को खारिज कर रहे थे, तो हत्या के इस मामले में वह चुप क्यों हैं। मैं यह नहीं कहता कि उन्हें इस संदर्भ में कोई राजनीतिक टिप्पणी करनी चाहिए। पर वह इस तरह का कोई बयान तो जारी कर ही सकते थे कि कोई भी हत्या-यहां तक कि किसी अपराधी की भी हत्या, गैरकानूनी है। अगर किसी आदमी या समूह की भावनाओं को आहत करने वाला काम कोई करता है, तो उससे निपटने के कानूनी तरीके हैं। वैसे में कानून को अपना काम करने देना चाहिए। प्रधानमंत्री की तरफ से ऐसा कोई बयान न आने से देश के अल्पसंख्यक समुदायों की चिंता ही बढ़ती है।

इस बार का जनादेश पहले ही इस धारणा को ध्वस्त कर चुका है कि सत्ता में आने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण जरूरी है। लेकिन मुसलमानों को इस देश से दूर नहीं किया जा सकता। सड़कों पर निकलने पर हर आठवां व्यक्ति मुसलमान मिलेगा। इस देश के मुसलमानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रधानमंत्री मोदी के हित में है। उन्हें प्रत्यक्ष तौर पर लोगों को आश्वस्त करना होगा कि वह सबके विकास के लिए काम करेंगे। लोग केवल दो वक्त का खाना और बुनियादी सुविधाएं नहीं चाहते। उन्हें सुरक्षा, आत्मगौरव और देश से जुड़े होने की भावना की भी जरूरत होती है। चुप रहकर प्रधानमंत्री मोदी मुसलमानों का दिल नहीं जीत सकते। बल्कि उनकी खामोशी उन लोगों को भी असहज करेगी, जिन्होंने उन्हें वोट दिया है और उनसे व्यापक उम्मीदें लगाई हैं। इतिहास में योद्धा राजाओं को नहीं, बल्कि विवेकी व्यक्तियों को याद किया जाता है। सम्राट अशोक अगर आज याद किए जाते हैं, तो इसलिए नहीं कि उन्होंने कई साम्राज्यों को परास्त किया था, बल्कि इसलिए कि बाद में वह शांति के प्रचारक बन गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतिहास के गहरे अध्येता हैं। इसलिए फिर से सम्राट अशोक के जीवन के बारे में पढ़कर वह खुद का भला कर सकते हैं।
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वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी ः द मैन, द टाइम्स के लेखक
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