अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) द्वारा वर्ष 2018 में केयर वर्क ऐंड केयर जॉब्स फॉर द फ्यूचर ऑफ डिसेन्ट वर्क नामक रिपोर्ट प्रकाशित किए जाने के बाद देखभाल कार्य नीतिगत बहस के केंद्र में रहा है। आईएलओ ने देखा कि देखभाल कार्य में कई ऐसे कौशल शामिल होते हैं, जिन्हें औपचारिक रूप से मान्यता या पारिश्रमिक नहीं दिया जाता है और वैसी कार्य स्थितियां शामिल रहती हैं, जिन्हें विनियमित नहीं किया जाता है।
इसके अलावा केयर वर्क यानी सेवा या देखभाल कार्य में निर्विवाद रूप से लैंगिक समस्या होती है, जिसमें दो तिहाई देखभाल कर्मी महिलाएं होती हैं, जो पुरुषों की तुलना में खुद को 3.2 गुना देखभाल कार्य के प्रति समर्पित करती हैं। आईएलओ ने 2019 की अपनी रिपोर्ट में अवैतनिक देखभाल कार्य को महिलाओं के औपचारिक रोजगार के लिए सबसे बड़ी बाधा के रूप में पहचाना, क्योंकि इसमें 18 से 54 वर्ष की आयु के बीच की 21.7 फीसदी महिलाएं शामिल होती हैं, जबकि 1.7 फीसदी ही पुरुष शामिल होते हैं।
देखभाल कार्य और देखभाल अर्थव्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें देखभाल के शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को पूरा करने की गतिविधियां और संबंध शामिल होते हैं। देखभाल कार्य और देखभाल अर्थव्यवस्था दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं का एक अभिन्न, लेकिन अबाधित घटक बना हुआ है, जिससे समुदायों का कल्याण सुनिश्चित होता है। देखभाल कार्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, सवैतनिक या अवैतनिक, अल्पकालिक (मातृत्व जरूरतों) या दीर्घकालिक (दिव्यांगों और बुजुर्गों की देखभाल के लिए) हो सकता है। देखभाल कार्य में कई क्षेत्र, मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कार्य होते हैं, जिनमें शिक्षक, नर्स, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, समाजसेवी और घरेलू कामगार शामिल होते हैं।
मध्य आय वाले देशों, जैसे कि दक्षिण एशिया के देशों में अवैतनिक देखभाल कार्य का बोझ गंभीर है, जहां महिलाओं की शादी कम उम्र में कर दी जाती है, वे कम पढ़ी-लिखी होती हैं और ग्रामीण इलाकों में रहती हैं। आईएलओ के अनुमान के मुताबिक, दक्षिण एशियाई महिलाओं की सवैतनिक रोजगार में भागीदारी 19.5 फीसदी है, जो उप-सहारा अफ्रीकी देशों की तुलना में कम है। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश की एक महिला अपने कुल समय का 41.4 फीसदी समय अवैतनिक देखभाल काम में लगाती है, जिससे उसके पास सवैतनिक रोजगार, आराम और अवकाश के लिए कम समय बचता है। महिलाओं के अवैतनिक देखभाल कार्य का असर बच्चों पर भी पड़ता है। वैश्विक स्तर पर 5.4 करोड़ बच्चे अपनी शिक्षा और स्वास्थ्य से समझौता करते हुए प्रति सप्ताह 21 घंटे से ज्यादा घरेलू काम करते हैं।
विभिन्न कारणों से 2030 तक देखभाल कार्य की मांग बढ़ने की संभावना है। पहला, निम्न एवं मध्य आय वाले देशों में जनसांख्यिकीय बदलाव के चलते कामकाजी आबादी की कीमत पर बुजुर्गों का अनुपात बढ़ेगा। दूसरा, शहरीकरण इन क्षेत्रों में पारंपरिक संयुक्त परिवार के ढांचे को न्यूक्लियर, एकल अभिभावक परिवार के रूप में बदल रहा है, जो सामुदायिक देखभाल से अलग-थलग है। तीसरा, जलवायु परिवर्तन ने पानी की कमी और ग्रामीण खाद्य संकट को बढ़ा दिया है, जिससे महिलाओं और बच्चों पर देखभाल का बोझ बढ़ा है। इसलिए देखभाल अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है। आईएलओ का अनुमान है कि 2015 के स्तर के सापेक्ष देखभाल में दोगुना निवेश से 2030 तक 11.7 करोड़ अतिरिक्त रोजगार पैदा होगा। इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कॉन्फेडरेशन (2019) के मुताबिक, भारत में देखभाल के लिए दो फीसदी जीडीपी के निवेश से 1.1 करोड़ रोजगार सृजित होंगे, जिनमें से 32.5 फीसदी महिलाओं को मिलेंगे। शिक्षा, स्वास्थ्य और सभ्य कार्यों के जरिये सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने वाली देखभाल अर्थव्यवस्था में व्यापक नीतिगत हस्तक्षेप जरूरी है। यह दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सामाजिक चार्टर उद्देश्यों और विकास लक्ष्यों से भी जुड़ा हुआ है।
हाल के वर्षों में, भारत और बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देशों ने भौतिक अवसंरचना में निवेश करना शुरू कर दिया है, जिससे परोक्ष रूप से देखभाल सेवाओं में सुधार होगा। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण (2018-19) ने सार्वजनिक नीति में तीन प्रमुख बदलावों की प्रत्याशा जताई है, जिससे उम्मीद है कि देखभाल अर्थव्यवस्था पर ध्यान बढ़ेगा। पहला, कामकाजी आबादी के घटते आकार और हिस्सेदारी ने अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रम को समायोजित करने के लिए उपयुक्त क्षेत्रीय नीतियों का आह्वान किया है, चरणबद्ध ढंग से सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाई गई है और पेंशन व अन्य सेवानिवृत्ति लाभ का प्रावधान किया गया है। दूसरा, स्कूल जाने वाली आबादी में कमी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2019 का ध्यान मौजूदा प्राथमिक विद्यालयों के विलय और समेकन की तरफ खींचा है और स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर दिया है। तीसरा, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा में वृद्धि ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में बुजुर्गों की देखभाल पर ध्यान खींचा है।
व्यापक देखभाल नीतियां देखभाल अर्थव्यवस्था में निवेश, उसे औपचारिक बनाने और विनयमित करने के लिए सरकारी संलग्नता बढ़ाने की मांग करती हैं। देखभाल का लाभ प्रदान करने के अलावा राष्ट्रीय खजाने को आर्थिक विकास में योगदान करने वाले अवैतनिक देखभाल कर्मी के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। देखभाल नीतियों में महिला श्रम शक्ति की भागीदारी में सुधार करने और समय के साथ लैंगिक वेतन असमानता को कम करने की क्षमता है। ये नीतियां श्रम उत्पादकता बढ़ाकर, कर्मियों की अनुपस्थिति घटाने के साथ कार्यस्थल पर निष्पक्षता और दक्षता लाकर नियोक्ताओं को लाभान्वित करती हैं। सबसे बड़ी बात है कि सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली देखभाल, देखभाल के कार्य को एक सामाजिक अधिकार के रूप में बदल देती है और देखभाल पाने वाले की गरिमा और स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है।
-फ्रांसिस कुरियाकोस कैंब्रिज विश्वविद्यालय में कैंब्रिज विकास पहल के सलाहकार हैं और दीपा अय्यर उसी विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट कर रही हैं।