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सच्चे संन्यासी की यह है पहचान

Tue, 27 Aug 2013 07:20 PM IST
शिवकुमार गोयल
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तीर्थंकर महावीर सत्संग के लिए आने वालों से कहा करते थे, सांसारिक मनुष्य को पत्नी और बच्चों के मोह में पड़कर गलत तरीके से धन अर्जित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। मोह में अंधा होकर आदमी पाप करने से भी नहीं हिचकता, पर जब उसका परिणाम भोगने का समय आता है, तब वह अकेला ही दुख भोगता है। अतः मोह, ममता और लोभ का त्याग कर किसी भी क्षण दुष्कर्म न होने पाए- इसका हरसंभव प्रयास करना चाहिए।
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भगवान महावीर ने साधकों से कहा, साधक को सदाचार का पूर्ण पालन करना चाहिए। जो निष्कपट तथा सरल होता है, उसी की आत्मा शुद्ध होती है और जिसकी आत्मा शुद्ध होती है, उसी के पास धर्म ठहर सकता है। सदाचारी, सात्विक और निष्कपट व्यक्ति ही साधना की अंतिम स्थिति यानी पूर्ण निर्वाण को प्राप्त होता है।

एक व्यक्ति ने तीर्थंकर से पूछा, दुख क्यों सताते हैं? भगवान ने उत्तर दिया, प्राणी, अपने-अपने दुष्ट कर्मों के कारण ही दुखी होता है। अच्छा या बुरा, जैसा भी कर्म हो, उसका फल भोगे बिना छुटकारा नहीं मिल सकता।
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भिक्षु के लक्षण पूछे जाने पर उन्होंने कहा, जो कटु वचन नहीं कहता, क्रोध नहीं करता, जिसकी इंद्रियां अचंचल हैं, जो संयम का पालन करता है और संकट आने पर व्याकुल नहीं होता, वही भिक्षु है। भिक्षु वेश से नहीं, सद्गुणों से होता है। जो सब प्रकार का त्याग करता है, वही सच्चा संन्यासी कहलाता है।
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