अपने लोकतंत्र का चुनावी महासंग्राम लगभग आधा निपट चुका है। ये नेताओं के दौड़ने-भागने-धूप में चलने के दिन हैं। भले ही हमारे जनप्रतिनिधि साढ़े चार साल तक इलाके में झांकने भी न आएं, पर चुनाव की मुनादी होते ही वे दौड़ पड़ते हैं।
नोटों और फूलमालाओं से लदे-फंदे जब वे इलाके में वोट मांगने पहुंचते हैं, तो छोटे बच्चे भी समझ जाते हैं कि चुनाव आ गए हैं। बीस-पच्चीस मिनट के पैदल दौरे में किसी नंग-धड़ंग बच्चे को गोद में उठा लेना, किसी लड़के के सिर पर हाथ फेर देना या बत्तीसी दिखाते हुए बुजुर्गों-महिलाओं के पास जाकर हाथ जोड़ लेना इनकी यूएसपी है। पांच साल में बमुश्किल दस-पंद्रह दिन ऐसा करना पड़ता है। क्या बुरा है?
कुछ नेता इस मौसमी कवायद में कुछ खास जुमलों का इस्तेमाल करते हैं। ज्यादातर छोटे-मोटे और राष्ट्रीय दलों का ऐसा ही एक मुफीद शब्दास्त्र है-सेक्यूलर। इसका इस्तेमाल करने वाले नेता अपने भाषण में यह बताना कतई नहीं भूलते कि वह सेक्यूलर हैं और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बनाए रखने के लिए उन्हीं की पार्टी को वोट देना चाहिए। हालांकि सिर्फ सेक्यूलर का असर नहीं होता। जिनके पास धनबल होता है, जिनकी छत्रछाया में बाहुबली पलते-पुसते हैं या जो धमनियों में खानदानी खून और रिश्ते का प्रेशर डालने का भाग्य लिखा लाए होते हैं, वे भी वरण योग्य जनप्रतिनिधि हो जाते हैं।
कई नेताओं की इस मौसम में खासी फजीहत होती है। कुर्सी पद की चिंता में खीझे इन नेताओं की प्रेस कान्फ्रेंसों-रैलियों में जुबान कभी फिसल जाती है, तो कभी डर्टी हो जाती है। कभी हाई कमान के इशारे पर जुबान गंदी कर ली और मीडिया में फजीहत होने लगी, तो खेद या सॉरी जैसे रवायती हल्का शब्द बोलकर उधार चुकता किया समझो। वचने का दरिद्रता! राजनीति का यही दस्तूर है भैया। बदजुबानी का तीर कमान से निकलकर लक्ष्यभेद कर भी ले, तो क्या जाता है अपना? अगर दबाव पड़ा, तो कह देंगे मीडियाकर्मी की नासमझी से यह सब हुआ है। अगर चुनाव जीत गए, तो पांच साल की तमाम चिंताओं से मुक्ति ही समझो।