यह तो बड़ा गजब हुआ जी! लोगों ने जिन्हें नाकारा समझ लिया था, वह तो करोड़ों के निकले। उन्होंने अपनी कीमत से साबित कर दिया है कि वह कितने काम के हैं! खेल के असली युवराज तो वही हैं। क्रिकेट में आज रन बनाने का स्तर धन बनाने से मापा जाता है। आप कितने भी रन बनाते हों, पर आपकी रेटिंग ‘बोली’ से ही लगेगी। यहां पारियों में शून्य बनाने का रिकॉर्ड भले न देखा जाता हो, पर बोली की राशि में कितने शून्य हैं, यह मायने रखता है। बदले में वह अपने खेल से अपनी टीम को कितने शून्य समर्पित करता है, यह बाद की बात है।
खेल की तरह राजनीति में भी एक युवराज हैं। उनके समर्थक उन्हें ‘अनमोल’ कहते हैं। खेल के युवराज को जहां कई शून्य चुकाकर अनमोल बनाया गया है, वहीं राजनीति वाले युवराज स्वयं अपने खाते में शून्य दर्ज कर रहे हैं। खेल और राजनीति में शून्य इस तरह हावी है कि दर्शक और जनता शून्य की ओर ताकने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती। एक को बाजार अपनी गोद में हिला रहा है, तो दूसरे को परिवार।
खेल को खेल की तरह समझने वाले लोग अंत में केवल मुंह ताकते रह जाते हैं, जब उन्हें पता चलता है कि उनकी जीत तो पहले से ही फिक्स थी। यही हाल राजनीति में जीत-हार का होता है। जनता जिसे अपनी जीत समझती है, वह अंत में उसका धोखा, जुमला या नसीब निकलता है।
आज बाजार का समय है। खरीदने-बिकने वाले ही असल खिलाड़ी हैं। मैदान में खिलाड़ी से ज्यादा मैदान से बाहर बैठे सट्टेबाज खेलते हैं। चुनावी जीत भी चंदेबाजों और धंधेबाजों की होती है। मगर ये सारी धारणाएं गुप्त घोषणा-पत्रों की तरह होती हैं। इनका पता तभी चलता है, जब कोई खिलाड़ी ‘हाई-स्कोर’ करके अपनी रेटिंग मजबूत कर लेता है। जनता की रेटिंग हमेशा से रेलवे के तीसरे दर्जे जैसी रही है।
फिलहाल करोड़ों में खेलने वाले अपने खाते दुरुस्त कर रहे हैं और हम जैसे निठल्ले उनके खाते में दर्ज शून्य गिन रहे हैं। सबका अपना-अपना नसीब है।