नील ऑर्मस्ट्रांग ने चांद से लौटने के बाद वहां के गड्ढों की जानकारी दी थी। तब दुनिया ने जाना था कि धरती वालों को ही गड्ढों से नहीं निपटना पड़ता, चांद में भी यही समस्या है। इसी कारण चंदा मामा के चेहरे पर भी धब्बे दिखते हैं।
हालांकि मां के भाई के दाग तो अच्छे हैं। इसलिए मामा को बदसूरत कहने की जुर्रत कोई नहीं करता। बिहार के एक नेता ने गड्ढेदार सड़कों को एक अभिनेत्री के गालों की तरह चिकना बनाने का ख्वाब देखा था। जरूरी नहीं कि तमाम ख्वाब पूरे ही हों। बिहार के नेताजी का वह सपना टूट गया।
लेकिन केवल बिहार नहीं, पूरा देश गड्ढों में उलझा है। राजनीति की राह कितनी पथरीली और गड्ढों भरी है, यह तो सब जानते हैं, लेकिन कुछ को इन गहरे गड्ढों में उतर कर राजनीतिक बिसात बिछाने में मजा आता है। उसमें भरा कीचड़ हाथों से निकालकर दूसरों पर फेंकने का आनंद ही कुछ और है। दागदार होने पर यहां भी वही फार्मूला फिट होता है कि दाग अच्छे हैं।
हाल ही में एक नेता जी अपने राज्य के गड्ढे भरकर कुछ फुर्सत में हुए, तो भारत भ्रमण को निकल पड़े। जिधर भी गए, उन्हें गड्ढे ही गड्ढे दिखे। एक पूर्व प्रधानमंत्री भी इन गड्ढों से बहुत परेशान थे। अक्सर उनके भाषणों में यह जुमला सुनाई देता था कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क, पता ही नहीं चलता।
बड़े-बड़े कवियों और दार्शनिकों ने भी जीवन पथ पर आने वाले गड्ढों और खाइयों को पार कर निडरता से आगे बढ़ने का जोश भरा है। ऐसे में किन्हें परवाह है गड्ढों की। आप अपने आसपास की किसी सड़क के गड्ढे के को ही ले लें। गड्ढेपन की शुरुआत बहुत छोटी होती है अगर उसे तभी भर दिया जाए, तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन बेपरवाह धड़ल्ले से दौड़ते वाहन और उपेक्षा उसे बड़ा गड्ढा बना देती है। फिर तय है कि लोग उस गड्ढे में गिरेंगे।
यह तो हो गए स्वतः बनने वाले गड्ढे। अब बात करें उन गड्ढों की, जो खोदे जाते हैं। अक्सर देखा गया है कि जैसे ही मोहल्ले की सड़क बनकर तैयार हुई, खुदाई करने वाले पहुंच गए। इससे साफ होता है कि गड्ढों को भरने और खोदने वालों की अलग-अलग सरकार है, जो अपने-अपने हुक्मरान के इशारे पर गड्ढे खोदते और भरते हैं। उन्हें पता है कि गड्ढे खोदने से भी पेट भरता है और भरने से भी।