ऐसे समय में, जब दुनिया के बड़े-छोटे देश रूस-यूक्रेन, अमेरिका-इस्राइल-ईरान युद्ध में कूद पड़े हैं, हम ‘बुद्ध’ की वैचारिकी पर आधारित ‘सम्यक साहित्य’ का वातावरण निर्मित कर शांति और प्रगति का संदेश दे रहे हैं। भारतीय साहित्य में कमजोर वर्गों को ‘बुद्ध’ चेतना का रास्ता डॉ. आंबेडकर ने दिखाया। विमर्श में बुद्ध की करुणा प्रभावी प्रतीत हुई। उनकी शिक्षाओं ने पाली व हिंदी के साथ-साथ अन्य भाषाओं में भी लंबी यात्रा तय की। अमर उजाला ने हाल ही में 11 मार्च, 1953 के इतिहास की खिड़की खोली। शीर्षक था ‘दक्षिण भारत में हिंदी का व्यापक प्रसार’। प्रकारांतर से दक्षिण में हिंदी का प्रसार आज भी जारी है। ऐसे में, कन्नूर विश्वविद्यालय, केरल में हाल ही में संपन्न हुई तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय ‘दलित साहित्यः समकालीन संदर्भ और चुनौतियां’ था। यह हिंदी की बढ़ती गत्यात्मकता और विविधता का भी संकेत था। यहां दलित साहित्य विषयक विभिन्न विधाओं में गुणवत्तापूर्ण शोध पत्र सुनने को मिले।
कुलपति प्रो. के के साजु ने उद्घाटन वक्तव्य में कहा, ‘दस वर्ष पूर्व हम हिंदी के दलित लेखक खोजते थे, किंतु आज गूगल, विकिपीडिया और चैटजीपीटी में दलित लेखक लिखते ही लोगों के नाम और काम, सब सामने आ जाते हैं। हिंदी का हमारा ज्ञान सीमित है, परंतु हम हिंदी साहित्य के पठन-पाठन, शोध और विमर्श में विविधता को बढ़ावा देते हैं। दलित-आदिवासियों के जीवन संघर्ष को समझने के लिए उनके लेखन से गुजरना सबसे सही माध्यम है।’ दलित आदिवासियों के जीवनानुभवों पर आधारित साहित्य-विमर्शों की अनुगूंज केरल में भी बखूबी सुनाई पड़ रही है।
केरल में हो रहे उत्साहवर्धक शोध एवं अनुवाद हिंदी-मलयाली, दोनों भाषाओं को समृद्ध कर रहे हैं। संगोष्ठी में पढ़े गए शोध पत्रों में हिंदी दलित कथा साहित्यः स्थितियां और चुनौतियां, दलित कविता में प्रतिरोध, दलित स्त्री कविता में सामाजिक संघर्ष, हम कौन हैं? और कहानी संग्रह में अस्मिता का सवाल अहम थे। हिंदी में समकालीन विमर्शों को आधार देने का श्रेय कथा मासिक हंस को जाता है। आजादी के बाद आश्वस्त किया गया था कि अंग्रेजी पर निर्भरता कम करके हिंदी को अपने पैरों पर खड़ा किया जाएगा। अब अंग्रेजी सीखने-सिखाने की आवश्यकता बढ़ती प्रतीत हो रही है।
‘कृत्रिम मेधा’ का युग और अंग्रेजी शिक्षा का व्यावसायीकरण दलित आदिवासियों के शिक्षा के अधिकार व मुख्यधारा में आने के मार्ग में बड़ी चुनौती है। ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने हिंदी का इतिहास व विस्तार अंग्रेजी में ही दर्ज किया था। भारत में भी आरंभिक दिनों में हिंदी के शोध प्रबंध अंग्रेजी में ही लिखे जाते थे। यहां जागरूक शोधार्थी सवाल करते हैं कि शोध के नाम पर तो मोटी कमाई की जाती है। ऐसे में, विमर्शों, विचारों, कविता, कहानी व आत्मकथाओं के दलित-ललित उत्पादन से किसका समाधान होता है?
निजी शैक्षिक संस्थाएं ज्ञान की उत्पादक कम, अंग्रेजी की विक्रेता अधिक हैं। सरकारी स्कूल पांचवीं के बाद अंग्रेजी विषय पढ़ाते हैं। अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी में बात करने पर बच्चे दंडित किए जाते हैं। साहित्येतर विषय तो अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाए जा रहे हैं। -लेखक डीयू में वरिष्ठ प्रोफेसर व पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष हैं।