बचपन में जिसने जासूसी किताबें पढ़ी हैं, वह नकाबपोश से परिचित होगा। कहीं लूटपाट, तो कहीं हत्या। वारदात के बाद पहुंचना पुलिस की चारित्रिक पहचान है। अगर पहले पहुंच जाते, तो वारदात कैसे होती? आज सबके दायित्व बदले हैं, वर्दी के भी। अब बड़ों की सुरक्षा, सलाम और सम्मान जैसी उसकी कई जिम्मेदारियां हैं। गणतंत्र में वह गणित फिट करती है कि कौन शातिर गृह विभाग का अगला सरगना होने जा रहा है। जनता जनार्दन में गरीब, अमीर, चोर उचक्के, शरीफ, बदमाश, साधु-संत योगी-भोगी आदि सभी शामिल होते हैं। जब तक हर वर्ग का प्रतिनिधि नहीं होगा, तो लोकतंत्र का ‘लोक’ कैसे पूरा होगा?
अपने विकास का कर्तव्य कुछ लूटकर निभाते हैं, ज्यादातर लुटकर। यह एक विवादास्पद विषय है कि पुलिस की इसमें क्या भूमिका है? वर्दी का तर्क है कि सारी करतूत नकाबपोश की है। अपराध स्थल पर न कोई गवाह है, न सुराग। वर्दी विवश है। न उंगलियों के निशान हैं, न चेहरे-मोहरे की पहचान। यहां तो बड़े-बड़े नकाब लगाए घूम रहे हैं। किसी की भी नकाब उतारना आसान नहीं है।
हमें लगता है कि श्रद्धालुओं की ‘पेड टोल’ है। वर्तमान बाजार युग में सिर्फ खबर ही नहीं, श्रद्धा भी बिकाऊ है। नकाब से नकदी पाते हैं और उस अवगुणी की अदृश्य खूबियों का ढोल बजाते हैं। रोगी मुल्क की निशानी है। जहां निदान की रत्ती भर संभावना भी नजर आए, उधर भीड़ दौड़ पड़ती है।
अपने जैसे निम्न मध्यवर्ग को पैसे बचाने की खब्त भी है। एलोपैथी दवा और डॉक्टर महंगे हैं। ठग बाबा आशीर्वाद से ठीक करते हैं। दिल्ली में एक तथाकथित सिद्ध गुरू था। वह चुप रहता। उसके यहां न भजन होते, न कीर्तन। सिर्फ उस फरिश्ते के चमत्कार के किस्से सुनाए जाते। महिलाएं उसके चरण चांपती। वह जिस पर प्रसन्न होता, उसे अपने पैर की जूती थमा देता। उसकी निदान पद्धति अनूठी। भक्त अपना पानी का पात्र लाए। वह उसे छूकर फरमाए, ‘जो पी ले, चंगा होगा।’ श्रद्धालु दावा करते हैं कि इस अमृत से कई कैंसर मुक्त हो चुके हैं। पता लगा कि खुद गुरु कैंसर से चल बसा।
आज नकाब कामयाबी की कारगर तरकीब है। नेता, अफसर, उद्योगपति सब इसके मुरीद हैं! एक नकाबपोश जेल जाए या स्वर्ग सिधारे, तो दस उसकी जगह लेते हैं! नकली मजहबी नक्कालों का अंत भले हो, नकाबपोशों का अंत संभव नहीं है!