एयर कंडीशन (एसी) सिर्फ एक सुख-सुविधा देने वाला उपकरण भर नहीं है, बल्कि यह लगातार गर्म होती दुनिया में जीवन बचाने वाला एक महत्वपूर्ण अनुकूलन यंत्र है। हालांकि यह भी वैश्विक तापमान बढ़ाता ही है। यही वजह है कि रवांडा के किगली में हाइड्रोफ्लोरो कार्बन के उपयोग को सीमित करने लिए हुए ऐतिहासिक समझौते की संरचना में अन्य चीजों के अलावा एयर कंडीशन एवं रेफ्रिजेरेटर को इतना महत्व दिया गया है। समझौते में इस बात पर जोर दिया गया है कि अगर लोगों के जीवन को बेहतर बनाना है, तो दुनिया, खासकर आज के गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से अवश्य मुकाबला करना चाहिए।
अब जरा इन तथ्यों पर विचार कीजिए ः अमेरिका में जहां 87 फीसदी परिवारों के पास एसी हैं, वहीं भारत में मात्र पांच फीसदी परिवारों के पास यह सुविधा उपलब्ध है। ऐसे में व्यापक रूप से हाइड्रोफ्लोरो कार्बन (एचएफसी) को सीमित करने के लिए किया गया कोई समझौता अपेक्षाकृत गरीब देशों के नागरिकों को एयर कंडीशन की सुविधा हासिल करने के अवसरों को घटाएगा। इन असमानताओं से निपटने के लिए किगली समझौते में देशों की तीन श्रेणियों वाली ट्रैक प्रणाली बनाई गई हैं। अमेरिका जैसे संपन्न देश तेजी से अमल करने वाली श्रेणी में रहेंगे, जो 2018 तक एचएफसी के उत्पादन और उपभोग को बंद करेंगे और एचएफसी के स्तर को 2036 तक 15 फीसदी के स्तर पर लाएंगे, जो वर्ष 2012 का स्तर था। बाकी दुनिया के ज्यादातर देश दूसरी श्रेणी के रूप में मध्य मार्ग अपना रहे हैं। और भारत जैसे सबसे गर्म देशों का एक छोटा-सा समूह उत्सर्जन घटाने के लिए सबसे धीमी रफ्तार को अपनाने के लिए सहमत हो गया है। परोपकारियों के साथ-साथ धनी देश मध्यम मार्ग अपनाने वाले देशों को प्रोत्साहन के रूप में आठ करोड़ डॉलर की सहायता राशि भी उपलब्ध कराएंगे। यह ट्रैक प्रणाली दर्शाती है कि ग्रीन हाउस गैसों के प्रदूषण को घटाने के लिए जरूरी है कि सभी देश भविष्य में होने वाले छोटे से जलवायु परिवर्तन के बदले आज अग्रिम लागत लगाना स्वीकार करें।
लेकिन इसका कोई सार्वभौमिक सही जवाब नहीं है कि इस लागत का संतुलन कैसे बिठाया जाए। विभिन्न देशों द्वारा अपनाए जाने वाले विकल्प उनके मौजूदा और भावी संपत्ति, मौजूदा और भावी जलवायु और अन्य कई कारकों के साथ उनके सामाजिक मूल्यों में परिलक्षित होंगे। ट्रैक प्रणाली इन अंतरों को स्वीकर करती है और भविष्य में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए संभवतः एक अच्छा मॉडल हो सकती है।
अब जरा वैश्विक जलवायु नीति के भविष्य पर एक नजर डालते हैं। इस संदर्भ में भारत की जलवायु नीति की चर्चा करना महत्वपूर्ण है। चीन और अमेरिका के बाद ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में भारत का स्थान तीसरा है और ऐसी आशंका है कि सदी के अंत में वहां ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन उच्चतम स्तर पर होगा। धीमी गति से ही सही, भारत ने ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने संबंधी संशोधन का समर्थन करने का फैसला किया है, जो बताता है कि वह जीवन को बचाने और जीवन-स्तर को बेहतर बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित करेगा।
हमारे सतत अनुसंधान में हमने पाया कि भारत में गर्म दिनों का असाधारण रूप से मृत्युदर पर काफी बड़ा प्रभाव पड़ता है। खासकर, जब गर्मियों में तापमान औसतन 35 डिग्री सेंटीग्रेड से ऊपर चला जाता है, तब ऐसे हर अतिरिक्त दिन का मृत्युदर प्रभाव भारत में अमेरिका की तुलना में 25 गुना अधिक होता है। इस समय भारत में हर साल औसतन पांच दिन गर्मी के लिहाज से बहुत घातक होते हैं। वैश्विक जलवायु नीति के बगैर सदी के अंत तक प्रति वर्ष ऐसेे 75 गर्म दिन होने की आशंका जताई जा रही है। जाहिर है, उच्चतम तापमान भारत के लिए बड़ा खतरा है और साथ ही यह जलवायु परिवर्तन की चपेट में है, जो देश की चुनौतियों को कमतर करके आंक रहा है।
अमेरिका में गर्म दिनों का प्रभाव मृत्युदर पर काफी कम पड़ता है, क्योंकि यहां एयर कंडीशन का उपयोग व्यापक रूप से होता है। हाल ही में मैंने अपने सहयोगियों के साथ एक अध्ययन किया, जो बताता है कि अमेरिका में गर्म दिनों के कारण होने वाली मौतों में 1960 से 2004 तक 80 फीसदी की कमी आई है और इसकी सबसे बड़ी वजह है एयर कंडीशन का बढ़ता उपयोग। इसलिए हम एक मुश्किल स्थिति में फंसे हैं-जो प्रौद्योगिकी लोगों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचा सकती है, वही जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने वाले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की दर को भी बढ़ावा देती है।
बाकी दुनिया की तरह भारत भी भविष्य के बारे में सोचे बगैर लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने का विकल्प नहीं चुन सकता। यानी उसे एक मुश्किल संतुलन बनाना होगा। भारत को न केवल पहले से ही गर्म जलवायु के प्रभावों से लोगों को बचाना होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लोगों को भविष्य में असहनीय जलवायु का सामना न करना पड़े। हो सकता है कि समय के साथ भारत समृद्ध हो और संभवतः प्रौद्योगिकी उसे किफायती विकल्प उपलब्ध कराए, जैसे सस्ते एयर कंडीशन, जिसमें एचएफसी के विकल्प का उपयोग हो। पर समझौता बताता है कि अभी भारत मौजूदा नागरिकों की समस्याओं पर ही ध्यान दे रहा है, जिन्हें उन खतरों का सामना करना पड़ता है, जो धनी राष्ट्रों के लोगों को नहीं करना पड़ता।
वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों के बीच यह संतुलन ही सभी देशों की जलवायु नीति संबंधी फैसले को आकार देता है। यह सोचना अवास्तविक होगा कि जो कुछ देशों के लिए सही है, वही सभी देशों के लिए सही होगा। लेकिन अभी हम जो फैसला करेंगे, वही तय करेगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का वातावरण सौंपना चाहते हैं।
-शिकागो यूनिवर्सिटी में एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के निदेशक