(एक अफगान से प्रेम विवाह कर अफगानिस्तान पहुंची सुष्मिता ने वहां तालिबान का जिस तरह मुकाबला किया, वह साहस और जिद की रोमांचक कहानी थी। उन्हें अब तालिबान ने खामोश कर दिया है। यहां पेश है उनकी बहुचर्चित किताब काबुलीवालार बंगाली बऊ का अंश)
सुबह के दस बज रहे थे। मैं गजनी चौकी के सामने खड़ी हूं। मदाली की चिट्ठी मिल गई थी। अब मैं काबुल की बस में चढ़ूंगी। गजनी बाजार में एक बैग की दुकान देखकर एक बड़ा बैग खरीदने के लिए मैं वहां गई। एक बैग खरीदा। फिर काबुल जाने वाली बस की गुमटी के पास जाकर एक आदमी से पूछा, 'कौन-सी बस काबुल जाएगी?'
अचानक एक लंबे से आदमी ने आकर मुझसे कहा, 'आप जानबाज की बीवी हैं न! रुकिए, बस में मत चढ़िएगा। आइए, मेरे साथ आइए।' इस बार भी मुझे लौट आना पड़ा। लेकिन अपने घर नहीं, रफीक खुरिए के घर जाना पड़ा। मुझे देखकर उनके घर में किसी को समझते देर न लगी। इससे पहले मैं पाकिस्तान चली गई थी, इस बात का भी उन्हें पता था।
घर के सभी सदस्य मुझे बिठाकर मेरे सिर पर हाथ फेरने लगे। उनके चार लड़कों की चारों बीवियां मेरे लिए खाना लाने गईं। रफीक की बीवी का स्नेहिल स्पर्श पाकर मैं खुद को रोक नहीं सकी। बीवी साहब की गोद में मुंह छिपाकर फफक-फफककर रो पड़ी। मुझे रोते देख वहां सभी रोने लगे। मुझे पकड़ लेने के अपराध में, पकड़ने वाले को बुरा-भला कहने लगे। बीवीजी चाहे जितना बुरा-भला कहें, इससे किसी को कुछ नहीं होने वाला। रफीक के बड़े लड़के सिद्दीक की बीवी का नाम अमिदा था। अमिदा फारसीभाषी थी। मुझे बड़ी अच्छी लगी।
मैं दूसरी मंजिल पर अमिदा के कमरे में बैठी थी। रफीक खुरिए का घर बहुत सुंदर था। अफगानिस्तान के घरों जैसा नहीं था। मिट्टी का ही घर था। पर दो मंजिला। नीचे बैठकखाने में मेरी ससुराल पक्षवाले मेरा फैसला कर रहे थे। मेरा क्या किया जाए, यही सोच रहे थे। गोली मारकर मार डालें या फिर हिंदुस्तान भेज दें? दो-चार तालिबानी भी आए थे। इन लोगों में सिर्फ एक आदमी पर मैं विश्वास कर सकती थी। वह थे द्रानाई चाचा। मेरे भागने की बात सारी नहीं, थोड़ी-बहुत तो वह जानते थे। सेरिना चाची ने कहा, डरियेजा मी यानी डरना मत। जे चाचाता वी याम यानी मैं चाचा को कह दूंगी। चाचा इससी ना आई यानी चाचा कुछ नहीं कहेंगे।
वही द्रानाई चाचा भी आए हैं। तालिबानी कह रहे हैं, ऐसे जघन्य चरित्र की महिला को मार डालेंगे। किसी तरह भी नहीं छोड़ेंगे। मैं बैठकखाने के दरवाजे के पास खड़ी होकर उनकी बातें सुन रही थी। तालिबान की बातें सुनकर मेरे दिमाग का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा है। एक जघन्य शरीयत की हिंसात्मक वृत्ति वाले लोग मुझे जघन्य चरित्र की महिला कह रहे हैं। और मैं? सरोजनी नायडू, रानी लक्ष्मीबाई, देवी चौधुरानी, इंदिरा गांधी के देश की महिला होकर कुछ बुरे लोगों के बुरे मंतव्य को खामोश रहकर सुन रही थी।
मैंने तुरंत फैसला कर लिया। मरूंगी, मैं मरूंगी, लेकिन इनके हाथों नहीं। और मरने से पहले इन तालिबान से पूछूंगी, मेरे चरित्र की किस जघन्यता का सुबूत मिला है तुम सबको? इसका जवाब मुझे चाहिए। मैं सीधे ऊपर गई। कमरे में कोई नहीं था। सभी नीचे थे। कमरे की दीवार पर कलाश्निकोव लटक रही थी। मैंने जानबाज से चलानी सीखी थी। काला खान की शादी के समय आसमान में ढेर सारी गोलियां दागी थीं। मशीनगन हाथ में लेकर देखा, गोलियां भरी थीं या नहीं? देखा, भरी हुई थीं। मशीनगन लेकर मैं नीचे आ गई।
मेरे माथे के दोनों तरफ की नसें यंत्रणा से फूल गई थीं। मैं खुद ही समझ पा रही थी, मेरे चेहरे पर एक आक्रोश, घृणा और हिंसा उभर आई थी। क्रोध, अपमान और होश-हवास खोकर मैं सीधे बैठकखाने में घुस गई। मेरे सिर से उस वक्त दुपट्टा भी सरक गया था।
मुझे इस तरह देखकर कमरे में उपस्थित सभी की मुझपर नजर पड़ी। मैंने मशीनगन का रुख तालिबान की ओर किया। संख्या में कुल पांच तालिबान थे। वे कैसे मूर्खतापूर्ण, मूक दृष्टि से अस्फुट स्वर में एक-दूसरे से बोले, दा सी आई? यानी ये क्या कह रही है?
'क्या कह रही हूं, समझ नहीं पा रहे हो? तुम लोग समझते क्या हो? मनमर्जी, सबके नाम पर झूठा कलंक लगाकर उनकी हत्या करोगे? मैं तुम लोगों को मौका नहीं दूंगी। मैं तुम्हारे हाथों नहीं मरूंगी। पहले मैं तुम लोगों को मारूंगी, फिर खुद को खुद ही गोली मारूंगी।' मेरी बातों से वे सब समझ गए कि मैं यों ही नहीं कह रही थी। द्रानाई चाचा ने मुझसे कहा, 'साहब कमाल, तुम शांत होओ। मैं तो हूं। तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं।'
बात ठीक थी। द्रानाई चाचा को सभी खूब मानते थे। श्रद्धा करते थे। उनकी बात मानने से कोई इनकार नहीं करता। फिर भी मैं रुकी नहीं, कहा, 'रुक जाऊं? चाचा क्या कह रहे हैं आप? ये तालिबान क्या कह रहे हैं, मैंने सब सुना है। मैं जघन्य चरित्र की हूं न? बोलो? ऐ तालिब, बोलो मेरे चरित्र की कौन-सी जघन्यता देखी है तुमने?'
तब तालिबान में से एक उठ खड़ा हुआ। वह शक्ल से ही हिंस्र पशु लगता था। उसकी ठुड्डी गले की कंठी से सटी हुई थी, सिर दाईं तरफ झुका हुआ था। आंखें ऊपर की ओर उठी हुई थीं। कपाल सिकुड़ा हुआ था। मेरे मुंह की तरफ देख रहा था। हाथ कमर पर थे। लग रहा था, मानो मुझे अभी खत्म कर देगा। उसकी ये नजरें देखकर कोई भी आदमी मूर्छित हो सकता था। पर आज मुझे किसी तरह का डर नहीं लग रहा, चिंता नहीं सता रही। मैं आज दृढ़ निश्चयी थी, मार कर मरूंगी। हारूंगी नहीं। कोई अपमान नहीं सहूंगी। अफगानिस्तान के सीने पर एक उदाहरण पेश कर जाऊंगी। इतिहास के पृष्ठों पर जब तक तालिबान रहेंगे, तब तक मैं भी रहूंगी...।