अब हम दूसरों के मामले में दखल न देने के आदी हो गए हैं। मैं देश के बड़े शहरों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के बारे में बात कर रही हूं। इस तरह की हिंसा अब रोज की बात हो गई है। औरतों को पीटा जाता है, घूरा जाता है, उन पर फिकरे कसे जाते हैं, पत्थर फेंके जाते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता है, बेल्ट से उनकी पिटाई होती है, उन पर चाबुक बरसाए जाते हैं, उनका यौन शोषण होता है, उन्हें जलाया जाता है, नंगा करके घुमाया जाता है...। औरतों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के और कितने ब्योरे चाहिए? ऐसा क्यों हो रहा है?
इसके पीछे एक तर्क है। दरअसल एक समय हमारे समाज में औरत बहुत उपेक्षित थी। यहां-वहां एक-दो औरतें मर भी जाती थीं, तो किसी को फर्क नहीं पड़ता था। किसी को औरतों की बदहाली की चिंता नहीं थी। यहां मैं केवल ग्रामीण औरतों की बात नहीं कर रही हूं। शहरी स्त्रियों को एक सीमा तक उपयोगी समझा जाता था, पर ससुराल में उनकी इज्जत नहीं थी। कई बार उनकी जगह दूसरी औरतें ले आई जाती थीं।
हमारे महानगर ऐसी औरतों से भरे पड़े थे, जिनसे घर और बाहर हाड़तोड़ मेहनत की अपेक्षा की जाती थी, लेकिन उम्र की ढलान पर उन्हें उनकी हालत में छोड़ दिया जाता था। अगर कभी दुर्योग से ऐसा नहीं होता था, और कुछ औरतें अपनी प्रतिभा और परिश्रम से उपलब्धि की नई पटकथाएं लिखती थीं, तो बहुत तेजी से उन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता था। पर वैसे में उनकी गैरमौजूदगी का शायद ही कभी नोटिस लिया जाता था, क्योंकि कुछ औरतें उनकी जगह लेने के लिए हमेशा तैयार रहती थीं। औरतों की वह नियति तो नहीं बदली है, लेकिन एक चीज बदल चुकी है।
आज की शहरी औरतें पुरुषवर्चस्ववादी समाज के खिलाफ लड़ रही हैं। इस लड़ाई में उनके पास सिर्फ एक हथियार है-उनका अपना पैसा। वे अच्छा कमाती हैं। लेकिन उनके वेतन का जो मोटा चेक उनकी रक्षा करने के लिए काफी होना चाहिए था, अब उनके गले की फांस बन चुका है। पुरुष ऐसी स्त्रियों को भी बहुत पसंद नहीं कर रहे। पार्टी में उन औरतों का खर्च करना उन्हें अच्छा लगता है।
इसके बावजूद वे इन स्त्रियों को पसंद नहीं करते, क्योंकि ये औरतें सामने वाले पुरुषों को व्यर्थता बोध से भर देती हैं। वे खुद से पूछते हैं कि क्या ये औरतें हमारा रोजगार छीन लेंगी! क्या हमारा बॉस इनके इशारों पर चलते हुए इन्हें बारी से पहले तरक्की दे देगा? इन नए खतरों के सामने खुद को असहाय पाते हुए वे वही करते हैं, जो कोई भी कुंठित प्राणी कर सकता है-वे गुर्राते और काट खाते हैं!
क्या मैं बहुत नाटकीय हो रही हूं? संभवतः। लेकिन मैंने कुछ उन मर्दों की आंखों में गुस्सा देखा है, जो अपनी महिला सहकर्मियों को कठोर परिश्रम करने के साथ-साथ बिना किसी शिकायत के दूसरे कामकाज भी करते हुए देखते हैं। ऐसे पुरुषों के चेहरे पर इन महिलाओं के प्रति झलकती ईर्ष्या साफ-साफ पढ़ी जा सकती है।
इस तरह उनमें उत्पीड़क का भाव पैदा होता है। हर औरत एक शिकारी, आक्रामक जीव के रूप में दिखाई देती है। उसके पर कतरने होंगे। उसे सबक सिखाना होगा। अगर वह पलटवार करती है, तो उसे और कठोर 'सजा' दी जाएगी। अगर वह माफी मांगती है, तभी समस्या का समाधान हो सकता है। बड़ी समस्या यही है कि वह स्त्री है।
दुनिया भर में नौकरियां कम हो रही हैं और महिलाएं इन नौकरियों तक पुरुषों से पहले पहुंच रही हैं। पुरुष यह देखकर खुश नहीं है। ऐसे में जो भी पहली औरत उसके रास्ते में आती है, उस पर वह अपना गुस्सा उतारता है। इस गुस्से की वजह कुछ भी हो सकती है-उसकी स्कर्ट छोटी है, वह जरूरत से ज्यादा मुस्कराती है।
पहले तो उसने हमारी नौकरियों पर अधिकार जमा लिया। अब वह उन जगहों पर भी कब्जा जमाने की फिराक में है, जो अब तक पुरुषों के लिए आरक्षित थे। अगर ये स्त्रियां इसी गति से आगे बढ़ती रहीं, तो जल्दी ही वे हम पुरुषों के लिए कायदा-कानून तय करने लगेंगी। अगर वे चुप रहने के अपने पुराने संस्कारों में नहीं लौटतीं, तो यही समय है कि उन्हें सख्त सबक सिखाया जाए।