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वे दलित समाज के हितैषी नहीं

Wed, 30 Jan 2013 11:17 PM IST
चंद्रभान प्रसाद
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जयपुर साहित्य उत्सव में आशीष नंदी ने 'रिपब्लिक ऑफ आइडिया' कार्यक्रम में दलितों के भ्रष्टाचार के बारे में जो विवादास्पद बयान दिया, वह पूरी तरह आधारहीन है। इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि दलित, पिछड़े या अनुसूचित जनजातियों के लोग भ्रष्टाचार कर रहे हैं, और न ही इस संबंध में कोई प्रामाणिक तथ्य है कि इन्हीं समुदायों के लोगों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो रहे हैं।
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ऐसा भी नहीं कह सकते कि आशीष नंदी जब यह विवादास्पद टिप्पणी कर रहे थे, तब वह इससे अनजान थे कि वह क्या कहने जा रहे हैं। टिप्पणी करने से पहले उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वह जो कुछ कहने जा रहे हैं, वह अभद्र और असांस्कृतिक है। साफ है कि उन्होंने सोच-समझकर बयान दिया था।

अपनी दलील के समर्थन में पश्चिम बंगाल का उदाहरण भी उन्होंने दिया और कहा कि वह सबसे कम भ्रष्ट राज्य इसलिए है, क्योंकि वहां पिछले सौ वर्षों में पिछड़े, अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोग सत्ता के नजदीक नहीं पहुंचे। यह कहते हुए आशीष नंदी वैचारिक रूप से विचलित हो गए थे। उनकी वह टिप्पणी निंदनीय थी, लेकिन केवल इसी कारण यह नहीं कह कह सकते कि वह दलित विरोधी हैं। अपने लंबे बौद्धिक जीवन में उन्होंने कभी दलित विरोधी एवं जातिवादी होने का कोई काम नहीं किया है।
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दलित समाज हमेशा उत्पीड़ित समाज रहा है। लेकिन उसने कभी अपनी लड़ाई तलवार के बल पर नहीं लड़ी। उसने हमेशा अपनी लड़ाई लड़ने के लिए तर्क का सहारा लिया। इतिहास का पन्ना पलटें, तो पता चलता है कि दलितों की सबसे बड़ी और पहली जीत तब हुई थी, जब संत रविदास ने काशी में ब्राह्मणों के साथ शास्त्रार्थ किया, और उसमें जीत हासिल की। वह तर्क और विवेक की लड़ाई थी। दलित समाज कभी हठधर्मी या कट्टर नहीं रहा है और न ही उसे ऐसा होना चाहिए। उसे अपनी लड़ाई बुद्धि और तर्क के बल पर लड़नी चाहिए। बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी विवेक और विद्वता को ही अपना औजार बनाया।
 
हमारे संविधान में जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, उसी में हरेक नागरिक के बीच बराबरी एवं सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार की भी वकालत की गई है। आशीष नंदी का बयान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उदाहरण था, तो सदियों से शोषण का शिकार रहे एक खास समुदाय पर उंगली उठाकर उन्होंने उसके सम्मानपूर्ण जीवन जीने के संविधान प्रदत्त अधिकार का उल्लंघन किया।

ये दोनों चीजें अंतर्विरोध भरी हैं, लेकिन अंतर्विरोध में ही चीजें निखरती हैं। अगर काला रंग नहीं होगा, तो सफेद रंग का कोई महत्व नहीं होगा। अगर झूठ नहीं होगा, तो सच की अहमियत नहीं रहेगी। अब देखिए कि संविधान में दलित समाज के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा गया है, लेकिन बाबा साहब अंबेडकर ने उसमें यह प्रावधान नहीं रखा है कि दलित समाज की आलोचना नहीं होगी। आलोचना कोई बुरी चीज नहीं होती। वाद-विवाद एवं मतभिन्नता स्वस्थ एवं जीवंत समाज के लक्षण हैं। उस पर कट्टर तरीके से विरोध नहीं जताना चाहिए।

दुखद यह है कि हमारे पूरे समाज में अपनी आलोचना सुनने एवं सहने की प्रवृत्ति लगातार घटती जा रही है। किसी भी विचारक के बयान या कलाकारों की कलाकृति से आहत होकर उसका प्रतिरोध करना एक बात है और उसके खिलाफ फरमान जारी करना या उस पर हमले करना या उसे थाने व कचहरी में घसीटना बिल्कुल दूसरी बात।

जो लोग आशीष नंदी के खिलाफ मुकदमे दायर कर रहे हैं, वे निश्चित रूप से दलित समाज के हितैषी नहीं हैं। उन्हें समझना चाहिए कि ऐसी हरकतों से दलित समाज की छवि खराब होगी और लोग सदियों से सहिष्णु रहे दलित समाज को भी कट्टर एवं हठधर्मी मानने लगेंगे। दलित समाज मात्र वोट वैंक नहीं है, जिसे भुनाया जाए।

आशीष नंदी को गिरफ्तार करने और उनके खिलाफ मुकदमा दायर करने के पीछे यही रणनीति काम करती दिख रही है। मैं पूरे दलित समाज से और मुकदमा दायर करने वाले सभी लोगों से अपील करना चाहूंगा कि वे कृपया ऐसा न करें और मुकदमा वापस ले लें। इससे दलित समाज का ही अहित होगा। दलितों में क्षमा करने की अद्भुत ताकत होती है। फिर आशीष नंदी ने जब माफी मांग ली है, तो दलितों को उन्हें क्षमा कर देना चाहिए। इसी में उनका बड़प्पन है।

हमें इस सच्चाई की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि भारतीय समाज में जाति व्यवस्था अब कमजोर पड़ने लगी है और दलित समुदाय के लोग भी तेजी से आर्थिक एवं सामाजिक विकास की राह पर अग्रसर हैं। कई ऐसे दलित उद्यमी है, जो आज लोगों को रोजगार दे रहे हैं।

दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री इसी का एक सुबूत है। दलित समाज में भी ऐसे लोग हैं, जो हर साल सौ करोड़ रुपये सरकार को कर चुकाते देते हैं। उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कई दलितों के अस्पताल, होटल, सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़े-बड़े उद्यम हैं।

ऐसे में अगर लोगों को लगेगा कि दलित समाज भी कट्टर एवं हठधर्मी हो रहे हैं, तो उनके प्रति समाज का नजरिया बदलने लगेगा और वे फिर से इस समाज के प्रति नफरत करने लगेंगे। इसलिए दलित समाज को शेष समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना चाहिए और हठधर्मिता नहीं दिखानी चाहिए। इस लिहाज से भी इस अप्रिय विवाद को और तूल देने का कोई मतलब नहीं।
 
अगर समाज में सहिष्णुता नहीं बचेगी, तो स्वस्थ बहस की परंपरा ही खत्म हो जाएगी। अगर हठधर्मिता की यह प्रवृत्ति अब भी नहीं रुकी, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रहेगा, जो निश्चित रूप से हमारे गणतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा।
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