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पिरूल से बिजली बनने के लाभ दिखेंगे

सुरेश भाई
Updated Mon, 10 Aug 2020 05:15 AM IST
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पहाड़ - फोटो : AmarUjala

पहाड़ों में चीड़ के पेड़ों की संख्या सबसे अधिक है। गर्मियों के समय में इसकी नुकीली पत्तियां, जिसे पिरूल कहते हैं, बड़ी मात्रा में झड़कर जंगल के बीच मोटी परत के रूप में जमा हो जाती है। पिरूल अत्यंत ही ज्वलनशील पदार्थ है, जिसमें हल्की-सी चिंगारी पड़ने पर भी जंगल में बेकाबू आग लग जाती है। इस कारण हर साल 10-15 हजार हेक्टेयर जंगल जल जाते हैं। इसके कारण छोटे-बड़े पेड़ों के अलावा वन्यजीव व सरीसृप मर जाते हैं।



इस बार प्रकृति की बड़ी मेहरबानी रही कि जनवरी से ही लगातार पानी बरसता रहा। खेती-किसानी को इससे लाभ होना ही था, और जंगल भी आग की चपेट आने से बच गए हैं। छिटपुट घटनाएं मई-जून के बीच हुई थीं, पर तब तक बारिश होने से पिरूल में लगने वाली आग पर नियंत्रण हो गया। इस बीच एशियाई विकास बैंक ने पिरूल से बिजली बनाने के लिए उत्तराखंड सरकार को 14 करोड़ रुपये की सहायता देने का एलान किया और मई-जून में इसे हरी झंडी मिल गई।


पिरूल से बिजली बनाने की मांग 1990 के दशक से उठ रही थी। उस दौरान पहाड़ की महिलाओं की पीठ का बोझ कम करने और वनाग्नि नियंत्रण के उद्देश्य से आईआईटी, दिल्ली और कन्सॉर्टियम ऑन रूरल टेक्नोलॉजी के सहयोग से टिहरी की सामाजिक संस्था लोकजीवन विकास भारती ने पिरूल और अन्य बायोमास से कोयला बनाने का प्रशिक्षण भिलंगना ब्लाक के कई गांव में दिया था।


पर तब समस्या यह थी कि एक ड्रम के अंदर नियत तापमान में जलकर तैयार होने वाले काले पदार्थ को हाथ से चलने वाले ग्राइंडर से पीसना पड़ता था। तब से इसके पीसने के लिए उचित तकनीक पर शोध कार्य चलता रहा। उत्तराखंड सरकार ने पिरूल तथा अन्य प्रकार के बायोमास से विद्युत उत्पादन नीति, 2018 घोषित की थी। उत्तराखंड में प्रतिवर्ष 14 लाख मीट्रिक टन पिरूल और लेंटाना, बासिया घास और कृषि से निकलने वाले अवशेष जैसे अन्य बायोमास से लगभग 150 मेगावाट बिजली बन सकती है। इसके अलावा राज्य में 2,000 मीट्रिक टन तक कोयला एवं बायो ऑयल के उत्पादन की संभावना है।


यदि पिरूल का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए होता है, तो जंगलों में आग लगने की घटनाओं पर 80 प्रतिशत तक रोक लग जाएगी। ऐसे में, निहित स्वार्थ से जंगल में आग लगाने वालों को आसानी से पकड़ा जा सकता है। चौड़ी पत्ती के वनों का विस्तार करना भी आसान होगा।


अनेक जगह वनों में लगी आग बुझाने में ग्रामीणों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। वन विभाग और वन पंचायत के सदस्यों के साथ जंगल की आग बुझाते हुए कई बार ग्रामीण महिलाओं की जान भी चली जाती है। पर अब यदि बिजली बनाने के लिए पिरूल का इस्तेमाल होता है, तो इसमें महिलाओं व वन पंचायतों को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए कि वे पिरूल को बिजली संयंत्रों तक पहुंचाएं, और इसका उन्हें पारिश्रमिक भी मिलना चाहिए।


अच्छा होगा कि गांव के महिला मंगल दल और स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के अलावा कोविड-19 के कारण घर लौटे प्रवासियों को भी पिरूल इकट्ठा करने का काम रोजगार के तौर पर सौंपा जाए। लोगों के खेतों में उग आई लेंटिना की झाड़ियां और अन्य बायोमास को भी उपयोग में लाने के लिए जागरूक करना पड़ेगा, ताकि उन्हें रोजगार भी मिल सके।
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राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा है कि वह महिलाओं को एक रुपया प्रति किलोग्राम के हिसाब से पिरूल का भुगतान करेगे। पर पहाड़ी इलाकों के जंगल में पिरूल एकत्रित कर संयंत्र तक पहुंचाने के लिहाज से पिरूल की कीमत किलोग्राम में नहीं, बल्कि रोज महिलाओं द्वारा जंगल से लाए जाने वाले 50-60 किलोग्राम के एक बोझ की कीमत के बराबर आंकनी चाहिए।


इससे लोगों का आकर्षण भी बढ़ेगा और संयंत्र भी अच्छी तरह काम करेंगे। जंगलों को आग से बचाने की यह तकनीक बहुत उपयोगी है, पर यह तभी कारगर होगी, जब इसमें स्थानीय लोगों को रोजगार देने का स्पष्ट लक्ष्य हो। इससे बिजली और कोयला तो बन ही जाएगा, वृक्षारोपण की वास्तविक तस्वीर भी सुधरेगी।

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