संघवाद, सरकार के अपने विभिन्न चरणों और सत्ता के जटिल वितरण के साथ संकटों के समय कई बार अंतर्निहित कारणों से निर्णय लेने की प्रक्रिया के उपयुक्त नहीं लगता। वित्तीय संकटों, विश्व युद्धों और महामारियों का इस्तेमाल अक्सर संघवाद के अप्रचलित होने की घोषणा करने के लिए किया गया है। इस तरह के संकट समन्वय की समस्या उत्पन्न करते हैं, जो कि कई सांविधानिक योजनाओं में प्रत्याशित नहीं थे और आपातकालीन शक्तियों के उपयोग को वैध बना सकते हैं, जो कि पहले से मौजूद सत्ता के वितरण को कुचल सकते हैं।
जैसा कि हेरॉल्ड लास्की ने 1930 के दशक में अमेरिका के बारे में लिखा था, 'संघवाद का युग समाप्त हो गया है ... केवल एक केंद्रीकृत प्रणाली ही नए समय की समस्याओं का प्रभावी ढंग से सामना कर सकती है।' या जैसा कि हाल ही में रोजेल और विलकॉक्स ने कहा, संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए व्यापक स्तर के राष्ट्रीय समन्वय और अंतरसरकारी सहयोग आवश्यकता होती है। केंद्र-राज्य संबंधों के नजरिये से देखें, तो भारत में कोविड-19 महामारी ने दो भूमिकाएं निभाईं। दोनों भूमिकाओं ने- अपनी केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण प्रवृत्तियों में- केंद्र-राज्य संबंधों के बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण कमजोरियों को उजागर किया है, जो कि भारतीय शासन की चुनौतियों के केंद्र में हैं।
कोविड-19 महामारी के खिलाफ भारत की प्रारंभिक प्रतिक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत थी, एक हद तक अतिनिर्धारित। दरअसल 2019 के चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने संघवाद के अपने केंद्रीकृत 'एक राष्ट्र' वाले दृष्टिकोण को संघन किया, क्योंकि वह अपना राजनीतिक प्रभुत्व मजबूत करना चाहती है। प्रधानमंत्री मोदी ने महामारी की शुरुआत में रातोंरात दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन लगा दिया। उन्होंने राज्य सरकारों पर जिम्मेदारी छोड़ने के बजाय कोरोना वायरस के खिलाफ केंद्र की त्वरित और निर्णायक कार्रवाई का श्रेय लेना चाहा।
भारत की भारी केंद्रीकृत प्रतिक्रिया की कई लोगों ने आलोचना की, क्योंकि देश के विभिन्न राज्यों में संक्रमण की दर और स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता में अंतर होने के बावजूद सभी राज्यों के साथ एक ही तरह का रवैया अपनाया गया था। इसके अलावा, सख्त लॉकडाउन के चलते खासकर भारत के विशाल असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए पैदा हुई सामाजिक व आर्थिक कठिनाइयों का जवाब देने की केंद्र एवं राज्यों की क्षमता का गंभीर परीक्षण भी हुआ। पिछली यूपीए सरकार के तहत, राज्य विशिष्ट उप-राष्ट्रीय कल्याणकारी व्यवस्थाओं का निर्माण करने में सक्षम थे। लेकिन कोविड से पहले शुरू हो गई केंद्रीकरण की प्रवृत्तियों ने राज्यों की राजकोषीय और नीतिगत स्वायत्तता को कमजोर कर दिया। डेकोवइंडिया: डिसेंट्रलाइजेशन ऐंड कोविड-19 नामक एक परियोजना के हिस्से के रूप में सहयोगात्मक अनुसंधान ने राज्य सरकारों द्वारा अपनाए गए सामाजिक सुरक्षा उपायों में भिन्नता को वर्गीकृत करने की कोशिश की है। राज्य सरकारें घोषणा करना चाहती थीं कि वे निर्णायक रूप से कार्य कर रही हैं, लेकिन कई मामलों में ऐसा करने की उनकी क्षमता सीमित थी।
फिर भी, सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों के अनुरूप समर्थन को प्रभावी ढंग से और तेजी से लक्षित करने के लिए स्थानीय संदर्भों की अनुकूलता महत्वपूर्ण थी, जैसा कि केरल के मामले में दिखाया गया है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है, राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के बाद राज्य की सीमाओं के पार प्रवासी श्रमिकों के अचानक और बड़े पैमाने पर हुई घर वापसी ने भारत की संघीय प्रणाली में असंगठित श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा के समन्वय के लिए एक प्रभावी अंतर-सरकारी ढांचे की कमी का खुलासा किया।
भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान, जो पहली लहर के मुकाबले गंभीर है, केंद्र की प्रतिक्रिया में एक उल्लेखनीय बदलाव देखा गया, जिसमें प्रमुख क्षेत्रों जैसे वैक्सीन की खरीद और वितरण का विकेंद्रीकरण कर दिया गया है। दूसरी लहर में, केंद्र की प्रतिक्रिया उसी तरह दिखती है, जैसे ब्राजील या अमेरिका की प्रतिक्रिया पहली लहर के दौरान थी। दूसरी लहर में राष्ट्र व्यापी लॉकडाउन तो नहीं लगाया गया, लेकिन स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन और कर्फ्यू की शृंखला चलाई गई। केंद्र पर निष्क्रिय रहने का आरोप लगाया गया है। सामूहिक समारोहों को कम करने के प्रति सुस्ती बरती गई, जिससे दूसरी लहर में स्थिति गंभीर बनी। इसने ऑक्सीजन आपूर्ति के अंतर-राज्यीय वितरण की निगरानी को प्रभावी ढंग से अदालतों और सोशल मीडिया के माध्यम से जुटे नागरिक कार्यकर्ताओं को सौंप दिया। वैक्सीन की कमी के लिए कई राज्य सरकारों की आलोचना के बाद, केंद्र ने राज्यों को 45 साल से कम उम्र के लोगों के लिए वैक्सीन की खरीद और वितरण की जिम्मेदारी सौंप दी। दूसरी लहर ने केंद्र को राज्यों पर कुप्रबंधन का दोष मढ़ते और अंतर-सरकारी संबंधों के लिए पहले से ही अति-पक्षपातपूर्ण संदर्भ में केंद्र-राज्य संघर्ष को तेज करते हुए दर्शाया है।
वैक्सीन की खरीद को विकेंद्रीकृत करने और वैक्सीन की बिक्री को उदार बनाने के निर्णय के साथ-साथ राज्यों में ऑक्सीजन आपूर्ति के उत्पादन और वितरण के समन्वय के लिए एक बुनियादी ढांचे के निर्माण में विफलता ने राज्यों को सबके लिए खुला छोड़ने का जोखिम पैदा किया, जिसमें केंद्र अंपायर नहीं था, बल्कि एक अन्य खिलाड़ी था। कोविड-19 में यूरोपीय संघों में निर्णय लेने के संघीय दृष्टिकोण को वर्गीकृत करने के लिए हेगेले और श्नाबेल द्वारा विकसित एक टाइपोलॉजी का उपयोग करते हुए, हम कह सकते हैं कि भारत पहली लहर में एकतरफा केंद्रीकृत निर्णय लेने की ओर बढ़ा, जबकि दूसरी लहर में लगभग एकतरफा विकेंद्रीकृत निर्णय लेने की तरफ बढ़ा।
भारत को एकतरफा केंद्रीकरण या विकेंद्रीकरण करने के बजाय राष्ट्रीय नीति ढांचे के भीतर स्थानीय नवाचार और अनुकूलन के लिए जगह के साथ केंद्र-राज्य समन्वय की आवश्यकता है। समन्वय में, कम से कम, केंद्र और राज्यों के बीच और/या राज्यों के बीच संचार, सूचना साझाकरण और चर्चा शामिल होगी। यह औपचारिक अंतर-सरकारी संस्थानों जैसे भारत की मरणासन्न अंतर-राज्य परिषद, नीति आयोग, या अधिक अनौपचारिक तंत्र के माध्यम से हो सकता है।