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ओंकार का कोई कॉपीराइट नहीं होता

Sat, 06 Apr 2013 11:35 PM IST
प्रवेश शर्मा
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प्रतिवर्ष सैकड़ों-हजारों पुस्तकें छपती हैं। इस सबके बीच कुछ पुस्तकें ऐसी भी होती हैं, जो निस्वार्थ भाव से कुछ करने और कुछ महसूस करने के लिए मजबूर करती हैं। ऐसी ही एक पुस्तक विनोबा भावे द्वारा लिखी गई गुरु नानक देव जी की वाणी ‘जपुजी’ की हिंदी टीका का पंजाबी अनुवाद देखने को मिली।
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पुस्तक के आवरण पर चित्रित भवसागर से उठता एक दिव्य हाथ बेहद सादगी से पुस्तक भीतर से खोलने के लिए मजबूर करता है। दूसरे पन्ने पर लिखी पंक्ति, ‘ओंकार और वचनों का कोई मूल्य और कॉपीराइट नहीं होता’ लेखन और प्रकाशन के उस जगत को धता बताती है, जो कुछ भी लोकार्पित न करके मात्र रॉयल्टी और कॉपीराइट के लिए ही जीता-मरता है।

जिस दौर में अपनी मिट्टी का भी मोल लग चुका हो, ऐसे दौर में अनुवादक ने 500 प्रतियां सिर्फ प्रसाद रूप में बांटने के लिए ही छापी हैं। मुफ्त पुस्तक बांटने का प्रयास सचमुच अपने ही आंगन में पराए होते समाज को बचाने की उम्मीद जगाता है।
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पंजाब की जिस हरित क्रांति को राज्य और केंद्र की सरकारें बगले बजाकर दुनिया भर में प्रचारित और प्रसारित करती रहीं, ऐसी हरित क्रांति को अनुवादक सुरेंद्र बांसल ने संताप की संज्ञा दी है। गुरु नानक देव जी के सब तेरा-तेरा के संदेश की याद दिलाते हुए अनुवादक दर्शाता है कि ‘तेरा-तेरा’ के अर्थशास्त्र से कोसों दूर हो चला पंजाब आज कैसे ‘मेरा-मेरा’ के गैर-जरूरी जंजाल में उलझा है।

अनुवादक गुरु साहिब की आध्यात्मिक यात्रा से जीवनयापन की यात्रा तक का हवाला देकर याद दिलाता है कि गुरु जी ने खेती-किसानी को उत्तम, व्यापार को मध्यम और चाकरी को निकृष्ट बताया था। लेकिन आज पूरे देश में किसानों की दशा देखकर कहा जा सकता है कि खेती निकृष्ट हुई है। देश की परंपराएं और संस्कृति सहेजने वाले हुनरमंद हाथों को रौंदने वाला व्यापार उत्तम हुआ है और उच्च शिक्षित नौकरशाही अपनी सुख-सुविधाओं के लिए चाकरी की प्रत्येक सीमा लांघ रहे हैं।

‘जपुजी’ की इस टीका के अनुवाद के पीछे अनुवादक के दिल की टीस साफ झलकती है कि पंजाब जैसे जिस प्रदेश में ‘जपुजी’ जैसे विराट दिशाबोध का साया पूरे लोकजीवन पर सदियों-सदियों रहा हो, वहां की मिट्टी, पानी, हवा, पशु-परिंदे और लोकजीवन के रंगों की फुलकारी कैसे बेरंग हो सकती है। अनुवादक इन तमाम संकटों की पड़ताल के पीछे प्रदेश के धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक मार्गदर्शकों को कुसूरवार मानता है। पुस्तक विषय के स्वभाव के अनुरूप बेहद सादगी और सुरुचि से छापी गई है। बेशक इस पुस्तक का स्वागत होना चाहिए।
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गुरु नानक देव जी की वाणी-जपुजी
टीकाकार-विनोबा
अनुवादक-सुरिंदर बांसल
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