हिंदी न तो वर्चस्ववादी है और न ही इसने कभी किसी पर हावी होने की कोशिश की है। हिंदी का जो विकास और प्रसार हुआ है, उसमें सरकारी तंत्र के बजाय संचार माध्यमों का ज्यादा योगदान रहा है। सिनेमा के जरिये हिंदी देश के हर कोने तक पहुंची। अब रील्स का जमाना है। कई ऐसे गैर-हिंदीभाषी हैं, जो हिंदी गीतों पर रील्स बना रहे हैं, वीडियो शूट कर रहे हैं और नए माध्यमों के जरिये मोटी कमाई कर रहे हैं। अगर हिंदी सचमुच वर्चस्ववादी होती, तो क्या गैर हिंदीभाषी उसे स्वीकार कर पाते? निश्चित तौर पर इसका जवाब न में है।
अव्वल तो हिंदी भाषी लोगों और सरकारी तंत्र को इस आख्यान को तोड़ना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सरकारी तंत्र में ऐसी सक्रियता नहीं दिखी। वैसे भी सरकारी तंत्र लीक पर चलने की कोशिश करता है। अगर कोई व्यक्ति, कर्मचारी या अधिकारी लीक से अलग हटकर सोचता या कदम उठाता है, तो पूरा तंत्र उसका विरोधी हो जाता है या फिर उसकी राह में रोड़े अटकाने की कोशिश करता है। इसलिए हिंदी के कथित विकास के लिए संचालित विभाग और तंत्र भी लीक पर चलते रहने और हिंदी दिवस के पाखंड में खुद को समाहित करने में ही भलाई समझते हैं। इस जड़ता को तोड़ने की कोशिश राजनीतिक नेतृत्व को करना चाहिए, क्योंकि नेतृत्व जैसा सोचने और करने लगता है, नीचे तक वही संदेश जाता है। बेशक नेतृत्व की वैचारिक विरोधी शक्तियां भी तंत्र में होती हैं। लेकिन एक सीमा के बाद वे विरोध का खुला साहस नहीं दिखा पातीं। अच्छी बात यह है कि इन दिनों जो राजनीतिक नेतृत्व है, वह हिंदी समर्थक है। उसे हिंदी में काम करने का अभ्यास है। वह हिंदी के पाखंड से दूर है। इसलिए हिंदी के आगे बढ़ने की उम्मीद अतीत की तुलना में कहीं ज्यादा है।
महात्मा गांधी हिंदी को देश की संपर्क भाषा के रूप में पहले स्थापित करना चाहते थे। उन्हें आशंका थी कि हिंदी का दक्षिण भारत में विरोध होगा। इसीलिए उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन के इंदौर सम्मेलन से हिंदी के पांच व्रती तैयार किए और उन्हें दक्षिण भारत में हिंदी के काम के लिए भेजा। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, कर्नाटक हिंदी प्रचार सभा, केरल हिंदी प्रचार सभा, राष्ट्रभाषा परिषद जैसी संस्थाएं उन्हीं दिनों जन्मीं और उन्होंने दक्षिण में हिंदी का प्रचार शुरू किया। गांधी के रचनात्मक शिष्य विनोबा ने तो सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी में ही लिखने का सुझाव दिया। गांधी की तरह विनोबा भी चाहते थे कि देश की संपर्क भाषा हिंदी बने। इस विचार को अगर हम संविधान लागू होने के बाद आगे बढ़ाए होते, तो शायद हिंदी विरोध की राजनीतिक आग, चिंगारी के रूप में भी जीवित नहीं होती।
गांधी की इस सोच को आगे बढ़ाने की कोशिश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने शुरू की है। गृह मंत्री बनने के बाद बिना राजनीतिक द्वेष के अमित शाह ने कहना शुरू किया कि हिंदी ही वह भाषा है, जिसमें पूरे देश को बांधने की क्षमता है। उन्होंने इस विचार को भी आगे बढ़ाया कि हिंदी ही भारत की संपर्क भाषा है। इस नाते वह समूचे देश के लिए राजकीय कामकाज की भाषा भी बन सकती है। अब सरकारी कामकाज का एक बड़ा हिस्सा हिंदी में होने लगा है।
संविधान लागू होने के बाद से ही यह हो रहा है। लेकिन हिंदी मौलिक रूप से प्राथमिक भाषा के रूप में काम करती और सरकारी व्यवस्था को अभिव्यक्त करती नहीं दिखती। बल्कि वह पचहत्तर वर्षों से सिर्फ अंग्रेजी के अनुवाद की भाषा बनी हुई है। सरकारी तंत्र के लोगों को पता है कि मूल काम, दस्तावेजीकरण, नीति निर्माण और अधिकारियों के आदेश तक अंग्रेजी में होते हैं। हिंदी में उसका अनुवाद भर होता है या फिर कभी हिंदी में किसी ने मौलिक टिप्पणी लिखने की कोशिश भी की, तो उसके मानस में अंग्रेजी का प्रभाव होता है। इसलिए शब्द तो हिंदी हो जाते हैं, लेकिन भाव अंग्रेजी का ही रह जाता है। गृह मंत्री की कोशिश जड़ हो चुकी इस प्रक्रिया को तोड़ना है, लेकिन इस सोच को जमीनी हकीकत बनने में वक्त लग रहा है।
ऐसा नहीं कि अमित शाह की सोच का राजनीतिक विरोध नहीं हुआ। 2019 में हिंदी दिवस के मौके पर गृह मंत्री ने जब ‘एक देश, एक भाषा’ के विचार के साथ हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में आधिकारिक तौर पर स्थापित करने का प्रयास किया, तो द्रमुक एवं तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया था। विरोध के सुर ज्यादातर दक्षिण से ही उठे। कांग्रेस तक ने इसका परोक्ष रूप से विरोध किया, जबकि उस बयान में सभी भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने की भी बात थी, जिसे अनदेखा कर दिया गया।
प्रधानमंत्री मोदी की अपनी संचार कला ने भी हिंदी के विस्तार में बड़ा योगदान दिया है। वह जब भी दक्षिण भारत जाते हैं, तो चुनावी भाषण हिंदी में ही देते हैं। भले ही उसका तत्काल तमिल, कन्नड़ या मलयालम में अनुवाद हो जाता है। वह हिंदी को प्राथमिक भाषा बनाए रखते हैं। यही स्थिति गृह मंत्री अमित शाह की भी है। वह भी हिंदी में ही अपनी बात रखते हैं। इसका असर सरकारी तंत्र पर पड़ा है। हालांकि नौकरशाही का एक बड़ा हिस्सा हिंदी को लेकर या तो रस्मी भाव रखता है या नजरंदाज करता है। इस जड़ता को तोड़ने की जरूरत है। वर्चस्ववाद तो सही मायने में भारतीय शरीरों में विदेशी भाषी सोच का है। यह जैसे-जैसे टूटेगा, हिंदी राजकीय भाषा की अपनी असल भूमिका को हासिल करती चली जाएगी। देश की संपर्क भाषा तो वह अपने दम पर बाजार की जरूरतों के लिहाज से करीब-करीब बन ही चुकी है।