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मुद्दा: महानगरों में तकलीफ साझा करने के कई वन स्टॉप सेंटर, दूर-दराज के इलाकों में रहने वाली महिलाएं क्या करें?

क्षमा शर्मा Published by: Pavan Updated Tue, 02 Jun 2026 08:12 AM IST

सार

महानगरों या नगरों में तो ‘वन स्टॉप सेंटर’ मिल भी जाएंगे, लेकिन दूर-दराज के इलाकों में रहने वाली महिलाएं आखिर क्या करें?
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तकलीफ का वन स्टॉप सेंटर - फोटो : अमर उजाला


2013 में उषा मेहरा आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि यौन उत्पीड़न तथा तमाम अपराधों की शिकार महिलाओं के लिए वन स्टॉप सेंटर की जरूरत है, जिसमें महिलाओं को इलाज के साथ-साथ दूसरी सुविधाएं भी मिल सकें। 2015 में इसी रिपोर्ट के आधार पर देशभर में महिलाओं के लिए वन स्टॉप सेंटर स्थापित किए गए। भारत  में ‘181’ टोल फ्री महिला हेल्पलाइन नंबर है। जैसे ही कोई परेशान महिला इस नंबर पर फोन करती है, जिस जगह से वह फोन कर रही होती है, यह नंबर अपने आप वहां के सखी वन स्टॉप सेंटर पर चला जाता है। स्क्रीन पर महिला का नाम, नंबर, जगह आदि दिखाई देने लगते हैं। इन केंद्रों पर काम करने वाली स्त्रियां, फौरन महिला से संपर्क करती हैं। यहां महिलाओं को पुलिस सहायता, आवास, खाना, इलाज, कपड़े, तथा अन्य जरूरत का सामान दिया जाता है। एक ही स्थान पर इन सभी सुविधाओं को प्रदान इसलिए किया गया है कि परेशान स्त्रियों को अलग-अलग जगहों पर भटकना न पड़े।


यहां जिस तरह की महिलाएं आती हैं, उनकी कहानी सुनकर दिल दहल उठता है। इनमें से बहुत-सी महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं, आत्मनिर्भर भी हैं। कई  विदेश में रहकर भी तरह-तरह की हिंसा और अपराध झेलने के लिए मजबूर होती हैं। किसी के पूरे शरीर पर चोट के निशान हैं। किसी की हड्डी टूटी हुई है। मारपीट, घर से निकालना आम बात है। किसी को घर में खाना तो क्या, चाय और बिस्कुट खाने तक पर पाबंदी है, क्योंकि इन पर पैसे खर्च होते हैं। ये भिन्न-भिन्न आर्थिक स्थितियों से आती हैं, पर सबकी कहानी लगभग एक जैसी ही है। पति और सुसराल वालों की मारपीट, तरह-तरह की हिंसा, ब्लैकमेलिंग, या फिर यौन उत्पीड़न। ये जैसे समवेत स्वर में कहती हैं कि उन्होंने बहुत कोशिश की कि मारपीट सहकर, भूखी रहकर भी अपने संबंधों को बचा लिया जाए, पर जब बहुत मजबूर हुईं, तभी हेल्पलाइन पर फोन किया।


ऐसा क्यों है कि हर तरह के अपराध झेलने के बाद भी लांछन और बदनामी सिर्फ महिलाओं के सिर ही आती है। जिन्होंने अपराध किए, उनका अक्सर कुछ नहीं बिगड़ता। महिलाओं को ही घर से बाहर निकाला जाता है। जो घरवाले दिखावे के नाम पर लड़कियों की शादी में अनाप-शनाप पैसा खर्च करते हैं, वे क्यों नहीं उनके लिए सबसे पहले एक छत का इंतजाम करते, जिससे कि किसी आपदा के समय वे वहां रह सकें। लेकिन, उन गरीब स्त्रियों का क्या, जिनके माता-पिता के पास संसाधन नहीं, वे जैसे-तैसे लड़की का विवाह करते हैं, और विवाह के बाद अक्सर मान लिया जाता है कि अब लड़की के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं रह गई। यह कथन कि ‘जिस घर में डोली आई थी, वहां से अर्थी ही निकले’, आज भी घरवालों के कानों में शायद गूंजता है, तभी तो, यदि लड़कियां अपने प्रति होते अत्याचारों को बताएं भी, तब भी घरवाले ध्यान नहीं देते। कहते हैं कि ऐसा तो होता ही है। एडजस्ट कर लो। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। पर, क्या ऐसा होता है। कितनी ही स्त्रियों को बिना आर्थिक मदद के बाल-बच्चों समेत, घर से बाहर निकाल दिया जाता है। वे दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होती हैं। अपने परिवार से भी शायद ही कोई सहायता मिलती है।


महानगरों या नगरों में तो वन स्टॉप सेंटर मिल भी जाएंगे, लेकिन दूर-दराज के इलाकों में रहने वाली स्त्रियां आखिर क्या करें? जिन्हें अपना माना, वे ही अगर दैत्य सरीखा व्यवहार करें, तो उनसे कैसे बचें। क्योंकि यौन अपराध के बानवे प्रतिशत मामले उन्हीं के द्वारा होते हैं, जिन्हें परिवार, परिचित या मित्र कहा जाता है। हाल ही के एनसीआरबी आंकड़े बताते हैं कि अपने देश में हर साल 4.5 लाख महिलाएं तरह-तरह के अपराधों का शिकार होती हैं। इनमें 31 प्रतिशत अपराध, पति या उसके परिवारजनों द्वारा किए जाते हैं।


इसलिए, इन महिलाओं को हेल्पलाइन नंबर्स की जानकारी अवश्य होनी चाहिए, जिससे कि जब भी जरूरत पड़े, वे मदद ले सकें।  स्कूल-कालेजों में भी इनकी जानकारी दी जाए, जिससे बच्चियां और बच्चे इन नंबरों के बारे में जान सकें और सुरक्षित रह सकें। - edit@amarujala.com

 
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