लोगों के बीच झगड़ा कभी खत्म नहीं होता, लेकिन मतभेद दूर हो जाते हैं। मतभेद पास आ गए हैं, ऐसा कभी, कोई नहीं कहता, लेकिन अब हमारे बीच मतभेद दूर हो गए हैं, ऐसा कहने वाले लोग हमेशा मिलते ही रहते हैं। ऐसा दोनों तरफ के लोग कहते हैं, तब मान लेने के अलावा कोई चारा भी नहीं रह जाता है। यह कोई नहीं बताता कि मतभेद आखिर थे क्या...! लेकिन यह सभी कहते हैं कि हमारे बीच के मतभेद दूर हो गए हैं।
उदाहरण के लिए, जब खिलाड़ी टीम से बाहर होता है, तब मतभेद पास रहते हैं, लेकिन टीम में आते ही खिलाड़ियों के बीच के मतभेद दूर हो जाते हैं। आप इसका उलटा भी कर सकते हैं कि मतभेद जब दूर हो जाते हैं, तब खिलाड़ी पास आ जाता है यानी टीम का हिस्सा हो जाता है। वैसी स्थिति में कोई मतभेद होने की बात तक नहीं करता।
मान लीजिए, अगर कोच और खिलाड़ी के बीच मतभेद हैं, तो किसी एक को बाहर होना ही पड़ता है। अब ग्रेग चैपल जैसे कोच कम ही होते हैं, जो खिलाड़ी से मतभेद की वजह से टीम से बाहर होते हैं। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि विदेशी कोच और देशी कप्तान में मतभेद होता है, तो बाहरवाले को ही बाहर होना पड़ता है। इसीलिए क्रिकेट में बाहरी यानी विदेशी कोच का प्रचलन है कि मतभेद होते ही उसे अपने देश भेज दिया जाए। देसी कोच से मतभेद खिलाड़ी अफोर्ड नहीं कर सकता। खिलाड़ी भी जानते हैं कि विदेशी कोच रहेगा तो अपन बने रहेंगे।
मुझे यह जानने की इच्छा है कि जब मतभेद दूर करने बैठते होंगे, तो बात क्या, और कैसे करते होंगे-
हम अपने मतभेद दूर कर लें...?- खिलाड़ी।
हां, तुम्हारी इच्छा है, तो कर लेते हैं- कोच।
...तो यह पक्का रहा कि हमारे बीच अब मतभेद नहीं हैं- खिलाड़ी।
तुम कह रहे हो, तो ठीक ही होगा- कोच।
वैसे हमारे बीच मतभेद थे क्या?- खिलाड़ी।
वह तो मुझे भी याद नहीं आ रहा...पर थे जरूर कुछ- कोच।
जब तुम्हें भी याद नहीं और मुझे भी नहीं...तो मान लेते हैं कि हमारे बीच मतभेद नहीं हैं।
हां, हम इस बात पर सहमत हैं... तो तय रहा?- खिलाड़ी।
हां...तय ही समझो...अगले मतभेद तक...!
कोच ने कहा और मतभेद दूर हो गए, दोनों पास आ गए!