कुछ और हासिल हुआ हो या नहीं, इस चुनाव के दौरान इतना तो हुआ है कि सेक्यूलरिज्म के ठेकेदारों का पर्दाफाश करने की कोशिश हुई है। एक पत्रकार होने के नाते मैंने कई लोकसभा चुनाव देखे हैं। कुछ ऐसी बातें सुनने को मिली हैं इस बार, जो पहले कभी सुनने को नहीं मिली। कभी सोचा ही नहीं था कि एक दिन भाजपा का कोई नेता हिम्मत करके किसी चुनावी मंच से कहेगा, जैसे नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह कहा, कि कांग्रेस के लिए सेक्यूलरिज्म सिर्फ अपनी नाकामियां छिपाने का बहाना है।
ऐसी बात, और वह भी ऐसे बंदे के मुंह से, जिसे सोनिया गांधी ने 'मौत का सौदागर' कहा था। मोदी जब सेक्यूलरिज्म पर अपना भाषण दे रहे थे गाजियाबाद के पास इंदिरापुरम की एक सभा में, तकरीबन उसी समय मैंने टीवी पर ऐसी बातें सुनीं जामा मस्जिद के इमाम बुखारी के भाई याह्या बुखारी से, जिन्होंने मुझे हैरान कर दिया। याह्या बुखारी ने कहा कि 2002 में गुजरात में जो हुआ मुसलमानों के साथ, उसकी जितनी निंदा की जाए, कम होगी, पर मुसलमान सबसे ज्यादा निशाने पर कांग्रेस शासन में रहे हैं। यह बयान देने का समय भी मुझे लगता है, उन्होंने सोच-समझकर तय किया था। यानी उनके भाई इमाम बुखारी के साथ सोनिया गांधी की मुलाकात के दो दिन बाद। सोनिया जी ने इमाम साहिब से मदद मांगी मुस्लिम मतदाताओं तक यह संदेश पहुंचाने के लिए कि उनको इकट्ठा होकर वोट देना होगा सांप्रदायिक ताकतों को हराने के लिए। इस 'सेक्यूलर' पैगाम पर भी सवाल उठे। क्या सोनिया जी का ऐसा कहना सांप्रदायिक नहीं था? मोदी अगर इस तरह का संदेश देते हिंदुओं को, तो क्या उनको सांप्रदायिक नहीं कहा जाता?
ऐसे सवाल अगर हम-आपने बहुत पहले किए होते, तो 'सेक्यूलरिज्म' की कई दुकानें बंद हो गई होतीं। और मेरा अपना विश्वास है कि वैसे में न 1984 में दिल्ली में सिखों को निशाने पर लिया जाता और न ही 2002 में गुजरात में मुसलमानों को। बहुत बार हुई है धर्म-मजहब के नाम पर सांप्रदायिक हिंसा 1947 के बाद, लेकिन हर बार हमारे अति सेक्यूलर राजनेताओं की नाकामी यही रही है कि न कभी ईमानदारी से तहकीकात हुई हिंसा रुक जाने के बाद, न कभी हत्यारों को दंडित करने की कोशिश हुई। उल्टे, जब भी पाया गया है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता शामिल थे हिंसा में, तो इसे छिपाने के लिए हर किस्म के हथकंडे अपनाए गए।
इस काम में हम मीडिया वालों ने भी मदद की है। मेरठ, मलियाना, भागलपुर, मुंबई, मुरादाबाद, लखनऊ, दिल्ली...कितने शहरों के नाम गिनाऊं, जिनमें वैसी ही हिंसा हुई, जैसी 2002 में गुजरात में हुई थी। ऐसा क्यों है कि हमको उन मुख्यमंत्रियों के नाम भी याद नहीं, जिनके शासनकाल में हुई थी ये सारी हिंसा? क्यों आज तक सिर्फ एक मुख्यमंत्री बदनाम हुए हैं इतना कि आज भी सेक्यूलरिज्म के ठेकेदार कहते फिरते हैं कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने का अधिकार नहीं है 2002 की सांप्रदायिक हिंसा के कारण? इनसे जब मैं पूछती हूं कि यदि राजीव गांधी को अधिकार था 1984 की सांप्रदायिक हिंसा के बाद, तो मोदी को क्यों न अधिकार हो, तो वे गुस्से में कहते हैं, 1984 की रट क्यों लगाए हो? न कोई दूसरा जवाब होता है इनके पास और न ही कोई दूसरा जवाब ढूंढने की जरूरत समझते हैं ये लोग, क्योंकि अपने आप को जो व्यक्ति सेक्यूलर समझता है भारत में, वह मेरे जैसे 'सांप्रदायिक' लोगों से अपने आपको ऊंचा समझता है।
अब जब नौबत आ गई है नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाने की, तो सेक्यूलरिज्म के ठेकेदारों में एक अजीब-सी घबराहट देखने को मिलती है। इस चुनाव में ऐसे सवाल उठने शुरू हो गए हैं, जिनसे सेक्यूलरिज्म का असली मतलब ढूंढने की कोशिश शायद शुरू हो जाए।