सोचा तो था कि दिवाली के मौके पर कुछ खुश करने वाली बातें इकठ्ठा करके लिखूंगी। माहौल में दिवाली का धुआं मौजूद रहगा, सड़कों पर दिवाली की खुशियां मनाए जाने के सबूत मिलेंगे, और त्योहार के बाद पहली बार मिलने पर लोग शुभकामनाएं भी देंगे। अच्छी खबरें जुटाने की जतन में लगी ही थी कि दिवाली की सुबह अपने साथ बुरी खबर लेकर आई। एक लड़की के जले हुए शरीर की तस्वीर अखबार के पहले पन्ने पर थी, उसके साथ लगी कहानी बड़ी बेरहम थी। यह मौत नहीं, हत्या थी। सरकार की गलत प्राथमिकताओं और गलत नीतियों द्वारा की गई हत्या।
कुछ हफ्तों पहले ऐसी खबर आई थी, जिस पर सरकार को चिंता व्यक्त करनी चाहिए थी। इसके पहले भी चिंताजनक खबर आई थी कि मोटर गाड़ियां कम बिक रही हैं, बिस्कुट के पैकेट तो बिक ही नहीं रहे। सरकार ने आनन-फानन में स्थिति सुधारने के लिए धनवानों पर लगने वाले टैक्स और सरचार्ज में भारी कटौती कर दी। तो लोगों की जेब में पैसा पहुंचाने का काम सरकार ने कर डाला। यह अलग बात है कि उसने पैसा गरीबों की जेब में नहीं, धनवानों की जेब में डाल दिया।
लेकिन जो दूसरी शर्मसार करने वाली खबर थी, वह तो आई-गई हो गई। वह खबर थी कि भारत पहले से भी अधिक भूखा देश है। 117 देशों की सूची में भारत 102वें स्थान पर है। यह आंकड़ा 2019 के ग्लोबल ह्ंगर इंडेक्स का है। स्तब्ध करने वाली बात तो यह है कि हमारे देश के बच्चों में ‘वेस्टिंग’ (धीरे-धीरे नष्ट होते जाना) पिछली रिपोर्ट (2012) के बाद चार प्रतिशत बढ़ गई है। हमारे पड़ोसी देशों-बांग्लादेश और नेपाल-का प्रदर्शन हमसे बेहतर रहा है। भारत में भूख की एक विशेषता और है-सबसे अधिक भूखे वे हैं, जो दूसरों का पेट भरते हैं। और यह सब तब है, जब सरकारी गोदामों में रिकॉर्ड 713 लाख टन अनाज जमा है।
देश के अंदर भूख की स्थिति पर भी सरकार इस तरह की रिपोर्ट पहले तैयार करती थी। अब यह काम उसने बंद कर दिया है। जब तक रिपोर्ट छपती थी, उत्तर प्रदेश की स्थिति परेशान करने वाली ही रहती थी। अब नहीं छ्प रही, तो स्थिति तो वैसी ही होगी। प्रदेश की सरकारों ने गरीबों को राशन न देने के तरह-तरह के प्रयास किए हैं और मौजूदा सरकार ने इस काम को बहुत ही सफल तरीके से अंजाम दिया है। राशन कार्ड भारी संख्या में निरस्त कर दिए गए हैं और लोगों को 'ऑनलाइन' में धकेला जा रहा है। ऑनलाइन पहुंचने में कम से कम पचास रुपये लगते हैं और मायूसी ही हाथ लगती है।
जिस लड़की की तस्वीर दिवाली के दिन छपी थी, वह बारह साल की थी। दिवाली की पूर्वसंध्या पर जब वह घर पहुंची, तो उसने पाया कि जिस रोटी के आधे टुकड़े पर उसका अधिकार था, उसे भी उसका भाई खा गया था। चारों तरफ दिवाली की तैयारियां दिखाई दे रही थी। कहीं मिठाई, तो कहीं पूड़ी महक रही थी। भूख से बेहाल बच्ची ने अपने ऊपर तेल डाला और आग लगा ली। उसके मां- बाप उसे अस्पताल ले गए, तो बाहर से दवा लाने को कहा गया। सरकार की दूसरी नाकामी ने काम पूरा कर दिया और वह बच्ची मर गई। सोचा, अगले दिन कुछ अच्छा देखने को मिलेगा। तो परेवा वाले दिन एक लड़की के सूखे चेहरे पर डरी हुई आंखें अखबार से झांक रही थी। अयोध्या के घाट पर सरकार द्वारा जलाए गए लाखों दीयों में से कुछ का बचा-खुचा तेल वह बोतल में भर रही थी और डर रही थी कि चोरी पकड़ी न जाए। उसे क्या पता था कि असली चोर तो कानून के हाथों से बहुत दूर, सुरक्षित बैठा है।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।