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स्त्री छवि का उनका खांचा

मनीषा सिंह Updated Wed, 27 Dec 2017 07:24 PM IST
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मनीषा सिंह
अमेरिका और ब्रिटेन जैसे खुले समाजों वाले देश 'कंटेंट वॉटरशेड टाइमिंग' जैसे तरीके का इस्तेमाल कर यह सुनिश्चित करते हैं कि टीवी पर ऐसी फिल्मों, धारावाहिकों और विज्ञापनों का प्रसारण उस वक्त न हो, जिस वक्त आम तौर पर बच्चे टीवी देख रहे होते हैं। इन विकसित देशों में भी ऐसी पाबंदी के पीछे यह धारणा काम कर रही है कि खुले समाज का अर्थ यह नहीं है कि वयस्क होने पर जिन चीजों की जानकारी मिलनी चाहिए, वे जानकारियां बच्चे टीवी के जरिये पहले ही जान लें। हालांकि वहां की शिक्षा में सेक्स एजुकेशन पर जोर है, पर टीवी पर गर्भनिरोधकों के ऐसे आकर्षक विज्ञापन लोगों को वहां भी नहीं पचते, जैसे इधर भारत में खुले तरीके से दिखाए जाते रहे हैं। ऐसे विज्ञापन टीवी पर किसी भी वक्त दिख जाते हैं और उस वक्त बच्चों के संग टीवी देख रहे अभिभावक या तो चैनल बदलने का विफल प्रयास करते हैं या फिर झेंप मिटाने के लिए निरर्थक प्रसंग छेड़ने का प्रयास करते हैं। ऐसे में यह मांग किसी न किसी स्तर से उठती रही है कि या तो ऐसे विज्ञापन और कार्यक्रम बंद कर दिए जाएं या उनके प्रसारण का समय बदल दिया जाए।


सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन्हीं शिकायतों के मद्देनजर तय किया है कि सुबह छह बजे से लेकर रात 10 बजे तक टीवी पर गर्भनिरोध के उपायों के विज्ञापन नहीं दिखाई देंगे। मंत्रालय का कहना है कि बच्चे ऐसे विज्ञापन न देखें, इस वजह से यह रोक लगाई गई है। पर इस रोक के फौरन बाद यह सवाल उठने लगे कि ऐसे में देश में यौन शिक्षा का क्या होगा, जिसके लिए ऐसे विज्ञापन ही शायद एकमात्र सहारा बने हुए हैं। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की ओर से तर्क दिया गया है कि ऐसे विज्ञापन तो दशकों से टीवी पर आते रहे हैं, फिर अचानक उनमें सरकार को ऐसा क्या आपत्तिजनक लगने लगा। कुछ अन्य विश्लेषकों का मत है कि सभी का अश्लीलता का पैमाना अलग-अलग है, ऐसे में यह पाबंदी गलत है। खास तौर से यह देखते हुए कि देश में सालाना हो रहे 1.5 करोड़ गर्भपात में से बहुत से अनचाहे गर्भधारण के कारण होते हैं, एचआईवी जैसी समस्या है और जनसंख्या नियंत्रण का मकसद है, तो बचाव यानी गर्भनिरोध के तौर-तरीकों के बारे में लोगों को जागरूक बनाना ही चाहिए और इसके लिए टीवी पर संबंधित विज्ञापनों का किसी भी वक्त प्रसारण उचित ही है।


पर प्रश्न है कि क्या ये विज्ञापन वास्तव में अपना उद्देश्य पाने में सफल रहे हैं या फिर उन पर जिस असहजता पैदा कर देने का आरोप है, वह सही है। इस सवाल के मद्देनजर 'पॉपुलेशन काउंसिल' के ताजा सर्वेक्षण के नतीजों को देखें, तो पता चलता है कि उनसे जागरूकता का मकसद हासिल ही नहीं हो पाया। यूपी की महिला एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने इस सर्वे रिपोर्ट को जारी करते हुए जानकारी दी कि यूपी के किशोर और किशोरियों को गर्भ निरोधकों की भी जानकारी नहीं है।

 

गर्भनिरोधकों के मौजूदा विज्ञापनों के बारे में यह आम शिकायत है कि उनमें स्त्री बेहूदगी के स्तर तक बदल गई है। यह सवाल भी है कि समाज की आम स्त्री से उलट छवि पेश करने वाले विज्ञापन निर्माता आखिर इतने शरीर-केंद्रित क्यों हैं? ऐसे विज्ञापनों में काम करने वाली महिलाओं के निर्णय के बारे में उंगली उठाना उचित नहीं होगा, पर देर-सबेर उन्हें भी यह बात समझनी होगी कि जिस जागरूकता, आजादी और अधिकार का झांसा देकर उनसे ऐसे विज्ञापन कराए जाते हैं, वे उनकी वास्तविक आजादी को प्रकट नहीं करते। यह पुरुषवादी समाजों का रचा छल है। 
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