विश्व रंगमंच दिवस प्रतिवर्ष 27 मार्च को मनाया जाता है। इसकी पहल 1961 में ‘इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट’ ने की थी। दुनिया भर में इस दिन रंगमंचीय संस्थाएं, विभिन्न रंगकर्मी और थियेटर प्रेमी, कई तरह के कार्यक्रम करते हैं। कोई नाटक प्रस्तुत करता है, कोई रंगमंच को लेकर कोई पोस्टर जारी करता है, कोई परिसंवाद आयोजित करता है, कुछ संस्थाएं किसी को व्याख्यान देने के लिए भी आमंत्रित करती हैं। इसी दिन स्वयं ‘इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट’ किसी विश्वप्रसिद्ध प्रतिष्ठित रंगकर्मी का एक संदेश जारी करता है। इसे दुनिया भर के ड्रामा स्कूल, थियेटर मंडलियां, और विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के थियेटर विभाग अपनी तरह से प्रचारित-प्रसारित करते हैं। वर्ष 2019 का संदेश लिखा है क्यूबा के दिग्गज रंग-निर्देशक, अभिनेता ‘कार्लोस सेल्ड्रान ने; वह कहते हैं : ‘जब से मैंने यह समझा कि थियेटर का अपना ही एक ‘देश’ है, अपनी ही दुनिया, तब से मैं इसके आकर्षण में बंध गया।' वर्ष 1962 में पहला संदेश फ्रांसीसी नाटककार, कवि ज्यां काक्त्यू ने लिखा था। इस संदेश का उद्देश्य यह है कि प्रयोगशील कोई दिग्गज रंगकर्मी, थियेटर संबंधी अपने अनुभवों को साझा करे, और थियेटर संबंधी जो चिंताएं और सरोकार उसके मन में है, उनके प्रसंग से किसी रंगमंचीय विमर्श को अग्रसर करे।
इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट का मुख्यालय पेरिस में है, पर अन्य देशों में भी इसके केंद्र हैं, जो चाहते हैं कि इस दिन कार्यक्रमों की गहमागहमी बनी रहे, और आम लोगों तक भी इस विशेष दिन के प्रसंग से, एक प्रकार की थियेटर-चेतना और चिंता के लिए जगह बने।
इस वर्ष के संदेश में कार्लोस सेल्ड्रान जो, हवाना में रहते हैं, और दुनिया के विभिन्न देशों में अपनी नाट्य-प्रस्तुतियां कर चुके हैं, बड़ी खूबसूरती से यह भी याद दिलाते हैं कि थियेटर के क्षण मिट जाते हैं। दुहराए नहीं जा सकते। वह अपनी प्रस्तुतियों में, अपने संदेश में, संस्कृतियों के बीच एक पुल बनाने पर जोर देते हैं।
यह जानना दिलचस्प और प्रासंगिक है, कि भारत का प्रतिनिधित्व ‘संदेश-प्रसंग’ में हो चुका है। वर्ष 2002 में सुप्रसिद्ध नाटककार, अभिनेता गिरीश कार्नाड ने विश्व रंगमंच दिवस का संदेश लिखा था, इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट के आग्रह पर। गौर कर सकते हैं कि आज दुनिया भर में बहुतेरी रंग-मंडलियां सक्रिय हैं, और नाट्य-प्रस्तुतियों में प्रयोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले ‘भारत रंग महोत्सव’ में विभिन्न देशों की नाट्य प्रस्तुतियों की जो झलक अब भारतीय दर्शकों को मिलने लगी है, वह यही बताती है कि नाटक की दुनिया में अब मंचसज्जा, आलोक परिकल्पना, डिजाइन, अभिनय—सभी में एक बड़ा परिवर्तन घटित हुआ है, और यथार्थवादी रंगमंच के साथ, अत्यंत कल्पना शील रंगमंच की सृष्टि हुई है। हमारे यहां इसका एक बड़ा उदाहरण सुप्रसिद्ध रंगकर्मी रतन थियम की नाट्य प्रस्तुतियां है, जो बिंब-रचना में, संगीत में, अभिनेताओं की गतियों में, हर बार कुछ ऐसा लेकर आती हैं, जो हमें चमत्कृत तो करता ही है, एक गहरी रंग-संवेदना से अनुप्राणित भी करता है। जाहिर है कि यह एकमात्र उदाहरण नहीं है, और केरल, बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब सहित कई प्रदेशों के वरिष्ठ और युवा रंगकर्मी साल-दर-साल भारतीय रंगमंच को समृद्ध कर रहे हैं।
हां, विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर हर वर्ष यह इंगिति और अधिक मिलती ही है कि थियेटर न केवल सक्रिय है, वह फिल्म, टी.वी. और अन्य माध्यमों के बीच, अपनी जीवंत उपस्थिति बनाए हुए है।