राजनेताओं की कुछ बातें हैं, जो हम राजनीतिक पंडित भी नहीं समझ पाते। सो विनम्रता से कहना चाहती हूं कि दलित समाज के साथ भारतीय जनता पार्टी का रिश्ता मैं बिल्कुल नहीं समझ पाई हूं। मेरे कहने का मतलब यह है कि 2014 में दलितों ने एकजुट होकर भाजपा को वोट न दिया होता, तो नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत किसी हाल में नहीं मिलता। यह भी स्पष्ट है कि 2019 में दलित मतदाता अगर अपना वोट अन्य दलों को देते हैं, तो एक बार फिर नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत मिलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। इस तथ्य की जानकारी होने के बावजूद ऐसा क्यों है कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है, उन राज्यों से इन दिनों हर दूसरे-तीसरे दिन दलितों पर अत्याचार की किसी न किसी नई घटना की सूचना मिलती है?
कभी हरियाणा से किसी दलित बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर देने की खबर आती है, तो कभी राजस्थान से ऐसा वीडियो अपलोड किया जाता है, जिसको देखकर शर्म आती है कि हम जिस देश के वासी हैं, वहां प्यार करने वालों को नंगा करके सरेआम सिर्फ इसलिए घुमाया जाता है कि उन्होंने विजातीय विवाह किया था। ऐसे ही कभी झारखंड से खबर मिलती है कि दलित परिवार भूख से मर रहे हैं, क्योंकि आधार कार्ड के बायोमेट्रिक औजार उनकी घिसी हुई उंगलियों के निशान नहीं पहचानते। गुजरात के ऊना में दलित युवकों को गाड़ी के पीछे बांधकर सरियों से पीटा गया था, तब प्रधानमंत्री ने उस घटना की स्पष्ट शब्दों में निंदा की थी। उस घटना का सीधा परिणाम जिग्नेश मेवाणी के रूप में हम आज देख रहे हैं। दलितों के साथ अत्याचार का यह सिलसिला शुरू हुआ पिछले वर्ष इसी महीने में, जब हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने केवल इसलिए आत्महत्या की, क्योंकि विश्वविद्यालय से निकाले जाने के कारण उसके सारे सपने टूट गए थे। उस समय मोदी के मंत्रियों ने रोहित के परिवार के साथ सहानुभूति जताने के बदले यह साबित करने की कोशिश की थी कि रोहित वेमुला दलित नहीं है।
अपने इस भारत महान में दलितों के साथ अत्याचार पहले भी होते रहे हैं, लेकिन मोदी जब प्रधानमंत्री बने, तब एक नई आशा लाए थे अपने साथ। पिछले सप्ताह एक दलित गांव में एक बुजुर्ग दलित ने मुझसे कहा, ‘मोदी हमको इसलिए अच्छे लगे, क्योंकि उन्होंने कहा था कि उनके दौर में सबका साथ, सबका विकास होगा। हमको वह बात अच्छी लगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है अभी तक।’ वह गांव एक भाजपा शासित राज्य में है, लेकिन पिछले चार वर्ष में वहां न सबके साथ का वायदा पूरा हुआ है, न सबके विकास का। आज तक गांव में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। बिजली न होने के बराबर है। स्कूल इतनी दूर है कि बच्चे जाते ही नहीं। स्वास्थ्य केंद्र है नहीं और अस्पताल कई कोस दूर शहर में है। गांव के सारे लोग अशिक्षित हैं, सो मजदूरी पर जिंदा रहते हैं, हालांकि मजदूरी ढूंढने भी वे पचास किलोमीटर दूर जाते हैं। देश के कई राज्यों में ऐसे अनेक गांव हैं।
इन गांवों में अब नई समस्या यह पैदा हो गई है कि गोरक्षकों के आतंक के कारण गाय-भैंसों को पालने का काम तकरीबन बंद हो गया है। विकास न होने का दोष गांव वाले स्थानीय अधिकारियों और मुख्यमंत्री पर डालते हैं, सो मोदी अब भी लोकप्रिय हैं। लेकिन सबका साथ-सबका विकास का उनका नारा अगर मूर्त रूप नहीं लेता, तो वह कब तक लोकप्रिय बने रहेंगे? सो प्रधानमंत्री के लिए बहुत जरूरी है कि वह दलितों की आवाज सुनें।