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निजता का अधिकार : सिद्धांतों की जीत

Wed, 30 Aug 2017 07:41 PM IST
रणदीप सिंह सुरजेवाला
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रणदीप सिंह सुरजेवाला
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निजता के अधिकार (राइट टू प्राइवेसी) पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है और पथ प्रदर्शक भी। इस निर्णय ने हमारे देश के बहुलतावादी चरित्र पर मुहर लगाई है। हमें यह याद दिलाया है कि विविधता हमारी संरचना का मूल है और वैचारिक मतभेद किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक संरचना की नींव। देश की राजनीति इस निर्णय से सकारात्मक रूप से प्रभावित होंगी। वस्तुस्थिति यह है कि हमारे केंद्र और राज्यों में ऐसी सरकारें हैं, जो व्यक्तिगत मामलों में बलपूर्वक हस्तक्षेप करने के मौके ढूंढती हैं। भाजपा ने निजता के अधिकार को खारिज करने पर कितना जोर दिया, यह जानने के लिए केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की ओर से आए तर्कों का आकलन करने की जरूरत है। उन्होंने निजता के अधिकार को वर्ग विशिष्ट तक सीमित मामला बताया। अदालत ने इस दलील को यह कहकर सिरे से खारिज कर दिया कि ऐसा तर्क सांविधानिक मान्यताओं और परिभाषा की परिपाटी का हनन होगा।
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इसके विपरीत गैरभाजपा शासित सभी राज्यों ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने का संपूर्ण समर्थन किया। अंत में सभी जज एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे कि निजता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा है।

बहस की शुरुआत इसलिए हुई, क्योंकि कई लोगों का मानना था कि यूपीए सरकार द्वारा पेश किए गए आधार कार्यक्रम ने, जो भाजपा सरकार द्वारा (पूरी तरह से भिन्न शर्तों पर) क्रियान्वित किया जा रहा है, निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया।
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यूपीए सरकार द्वारा लागू किया गया ‘आधार’ सीमित सेवाओं पर लागू और ऐच्छिक था, पर भाजपा सरकार ने लगभग सभी सेवाओं के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया। बिना किसी ठोस आधार के विभिन्न सेवाओं, जैसे-रेलवे टिकट, पैन कार्ड, यहां तक कि मृत्यु प्रमाण प्राप्त करने के लिए भी आधार को अनिवार्य बनाने की कोशिश की। नागरिकों के डाटाबेस बार-बार लीक होने तथा नागरिकों को अपनी निजी सुरक्षित रखने के अधिकार से वंचित करने वाले कानूनों ने सरकार द्वारा इस योजना के क्रियान्वयन के बारे में कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए। कांग्रेस ने इस कानून को मनी बिल के तौर पर वर्गीकरण और संसद में पेश करने को अनुचित ठहराया, क्योंकि इस प्रकार सत्तपक्ष राज्यसभा को इस कानून पर अपनी राय देने से वंचित करने की साजिश कर रहा था। निजी जानकारी को लोगों के व्यक्तिगत जीवन पर निगरानी रखने के लिए इस्तेमाल करना भी चिंता का विषय है। व्यक्ति के जीवन में कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिनमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

‘आधार’ के बारे में सरकार की सोच को अब ‘निजता के अधिकार’ के तहत व्यापक मूल्यांकन से गुजरना होगा। सरकार ने बिना किसी पश्चाताप के प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग करके नागरिकों की यात्रा, संचार और वित्तीय जानकारी एकत्रित की। उस पर लोगों की निजी जिंदगी में सेंध लगाने और निगरानी रखने का आरोप लगता रहा है। इसलिए यह निर्णय सही समय पर दी गई सही चेतावनी है।

एक प्रजातांत्रिक देश में सरकार को लोगों की जरूरतों और उनकी भावनाओं को समझना अति आवश्यक होता है। अदालत के अंदर और बाहर हुई बहस और इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि केंद्र सरकार अपना यह मुख्य लक्ष्य भुला चुकी है कि सरकार जनता की सेवा करने के लिए चुनी जाती है, न कि उन पर निरंकुश शासन करने के लिए।
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-विधायक और कांग्रेस के मीडिया प्रभारी  
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