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बीमार अम्मा की विरासत का सवाल

Wed, 12 Oct 2016 12:05 PM IST
आर राजगोपालन
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जयललिता
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तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के बीमार होने से न सिर्फ उनकी पार्टी अन्नाद्रमुक, बल्कि विपक्ष समेत पूरा राज्य दुखी है। गौरतलब है कि तबीयत खराब होने के बाद बीते 22 सितंबर को जयललिता को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मुख्यमंत्री जयललिता के बीमार होने से निश्चित रूप से राज्य सरकार के कामकाज पर असर पड़ रहा होगा, क्योंकि राज्य की शासन-व्यवस्था के सभी महत्वपूर्ण मसलों को जयललिता स्वयं संभालती थीं और कोई दूसरा चेहरा नहीं है, जो उनकी तरह कामकाज संभाल सके।
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यही वजह है कि विधानसभा में विपक्ष के नेता और प्रमुख विपक्षी पार्टी द्रमुक के कोषाध्यक्ष एमके स्टालिन ने राज्य में कार्यवाहक मुख्यमंत्री की नियुक्ति की मांग की है। पिछली बार जब जयललिता को जेल जाना पड़ा था, तो उन्होंने अपने वफादार माने जाने वाले नेता ओ पन्नीरसेलवम को कार्यवाहक मुख्यमंत्री नियुक्त किया था। हालांकि पन्नीरसेलवन कभी जयललिता की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे भी नहीं और राज्य का शासन वह जयललिता के निर्देश पर ही संभालते रहे। इस बार ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है।

यदि थोड़ी देर के लिए यह मान लिया जाए कि स्वास्थ्यगत कारणों से जयललिता को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा, तो उनकी विरासत कौन संभालेगा? ऐसे में मुझे लगता है कि उनकी विरासत को अगर कोई अच्छी तरह से आगे बढ़ा सकती है, तो वह शशिकला ही हैं, जो उनके साथ तीस वर्षों से हैं। पन्नीरसेलवन को तो अन्नाद्रमुक ही आगे नहीं बढ़ाएगी, क्योंकि जातिगत समीकरणों के लिहाज से वह कमजोर पड़ते हैं।
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जयललिता अपने राजनीतिक गुरु एमजी रामचंद्रन के नक्शेकदमों पर चल रही हैं, इसलिए उनकी लोकप्रियता ज्यादा है और राज्य की जनता भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ी है। उन्होंने चेन्नई को स्मोकिंग फ्री कर दिया है और ग्रामीण क्षेत्रों को भी शराब-सिगरेट से मुक्त कराने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। राजनीति में आने से पहले वह फिल्म अभिनेत्री थीं और शराब-सिगरेट निषेध तथा महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर आधारित फिल्मों में उन्होंने काम किया। अब राजनीति में भी वह उन्हीं किरदारों के अनुसार काम कर रही हैं। अम्मा ब्रांड उत्पादों के चलते लोगों, खासकर महिलाओं के बीच उनकी पैठ ज्यादा है, जो राज्य में बहुसंख्यक मतदाता हैं। उन्होंने इतना काम किया है कि द्रमुक का जल्दी उभरना संभव नहीं है।

जयललिता कावेरी का पानी नहीं छोड़े जाने के कारण कर्नाटक पर गुस्सा हैं, क्योंकि तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों में खड़ी फसलों को पानी नहीं मिलने से नुकसान हो रहा है। कावेरी जल विवाद ने जयललिता को परेशान कर दिया, खासकर राजनीतिक रूप से ज्यादा। वास्तव में उनका मानसिक तनाव सिद्धरमैया के भड़ाकाऊ बयानों से ज्यादा बढ़ गया। दूसरा सबसे विवादित मुद्दा जीएसटी का था। जयललिता की पार्टी ने जीएसटी पर मतदान के दौरान संसद से बहिर्गमन करके उसे पारित कराने में मोदी सरकार की मदद की थी। पर अब आगे क्या होगा, यह निश्चित नहीं है।

चूंकि तमिलनाडु एक सीमावर्ती राज्य है, इसलिए जयललिता के बीमार होने से राज्य की कानून-व्यवस्था पर उसका असर पड़ना निश्चित रूप से केंद्र सरकार के लिए परेशानी का सबब होना चाहिए। श्रीलंका में जब लिट्टे के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कर उसे लगभग खत्म कर दिया गया, तब जयललिता को बड़ी राहत मिली थी। चेन्नई में लिट्टे के तमाम शिविरों को उन्होंने सख्ती से कुचल दिया। वह ऐसी मजबूत राजनेता हैं, जो कानून-व्यवस्था के मुद्दे से सख्ती से निपटती हैं। उनके इसी आक्रामक रुख के कारण तमिलनाडु में शांति की बहाली हुई है और लिट्टे के आतंकियों का सफाया हुआ है। लेकिन अगर वह लंबे समय तक बीमार रहती हैं, तो कानून-व्यवस्था की स्थिति पर उसका प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि अस्पताल जाकर उनके प्रति निष्ठा जताने के अलावा कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो कुछ बोल या कर सके। जयललिता के बीमार होने से राज्य की पूरी प्रशासनिक मशीनरी प्रभावित है और प्रशासन व्यवस्था अधर में लटकी है।

राज्यपाल विद्यासागर राव को सिस्टम को निर्देश देने और प्रशासनिक मशीनरी में तालमेल बिठाने के लिए मुंबई से चेन्नई आना पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी ने ही राज्यपाल को शासन-व्यवस्था पर नजर रखने का निर्देश दिया है।

यदि निष्पक्ष विश्लेषण करें, तो जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी नरम और सावधानीपूर्वक तमिलनाडु की राजनीतिक स्थिति से निपट रहे हैं, वह एक मास्टर स्ट्रोक जैसा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि अन्नाद्रमुक तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है, जिसके लोकसभा और राज्यसभा दोनों में कुल 50 सांसद हैं। इसलिए मोदी इस स्वाभाविक सहयोगी को भड़काना नहीं चाहेंगे। अतीत में भी नरेंद्र मोदी और जयललिता के बीच बेहतर तालमेल रहा है, क्योंकि मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में जयललिता गुजरात गई थीं और मोदी भी जयललिता के शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित थे। और सबसे बड़ी बात है कि अन्नाद्रमुक राम मंदिर निर्माण के समर्थन में है। इन सब कारणों से मोदी को जयललिता और उनकी पार्टी से नैतिक समर्थन मिलता रहा है।

सवाल उठता है कि अपनी उत्तर प्रदेश की किसान यात्रा पूरी करने के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी क्यों तुरंत जयललिता को देखने चेन्नई पहुंचे। कांग्रेस की इसमें क्या दिलचस्पी है, जबकि उसका द्रमुक के साथ गठजोड़ है। अचानक राहुल गांधी के उन्हें देखने जाने से राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है, उससे पहले अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ताओं के अलावा कोई भी परेशान नहीं था।

सवाल उठता है कि राज्य की प्रशासनिक मशीनरी कब तक पंगु बनी रहेगी। ऐसे में जरूरी है कि एक कार्यवाहक मुख्यमंत्री की नियुक्ति हो, जो रोजमर्रा के नीतिगत मसलों को निपटाए। अन्नाद्रमुक को इस मसले को सुलझाना चाहिए। राज्य की स्थिति खराब है, और इसका खामियाजा मतदाताओं को भुगतना पड़ रहा है।
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