वर्ष 2016 के इन आखिरी दिनों में कई तरह के रिपोर्ट कार्ड हमारे सामने आएंगे। लेकिन एक सबसे खराब रिपोर्ट कार्ड जो हमें पढ़ने को मिलेगा, वह वर्ष 2016 में संसद के कामकाज से संबंधित होगा। वर्ष 1952 से शुरू संसद के 64 वर्षों के लंबे प्रतिष्ठित इतिहास में वर्ष 2016 पूरी तरह से अलग रहा। एक सांसद के रूप में दस वर्षों के अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि कामकाज के लिहाज से वर्ष 2016 में संसद का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है, क्योंकि यह शोर-शराबे वाली गैलरी बनकर रह गया।
संसद के मुख्यतः तीन काम हैं। पहला, विचार-विमर्श और कानून बनाने का, दूसरा, कार्यपालिका की निगरानी और शासन में जवाबदेही तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करना और तीसरा महत्वपूर्ण स्वतंत्र नियामकों की देखरेख तथा संसद में पेश उनकी रिपोर्टों की संवीक्षा। अपनी इन तीनों जिम्मेदारियों का संसद ने त्याग कर दिया और शासन चलाने में कार्यपालिका के संसद पर निर्भर नहीं रहने के कारण इसकी प्रासंगिकता तेजी से घटती चली गई। इसके जोखिम और खतरे दूरगामी हैं। संसद देश के लोगों की ओर से सरकार और स्वतंत्र निकायों पर नजर रखती है और इस जिम्मेदारी को त्याग देने का मतलब है बेहद जरूरी निगरानी का अभाव। विधायी भूमिका के मामले में भी इसका प्रदर्शन बहुत विचित्र रहा, क्योंकि कुछ ही विधेयकों पर चर्चा हुई और ज्यादातर विधेयक या तो अल्प चर्चा या बिना चर्चा के पारित किया गया। अल्प चर्चा या बिना चर्चा के पारित हुए विधेयक समस्याएं सुलझाने की तुलना में ज्यादा समस्याएं पैदा करते हैं। ऐसे कानूनों का बेहतर उदाहरण वर्ष 2008 में पारित आईटी ऐक्ट या हाल ही में पारित आधार विधेयक है। यूपीए शासन के दौरान पारित आईटी ऐक्ट हमें बताता है कि समय के भारी दबाव के तहत संसद में पारित होने वाला कानून अनिवार्य रूप से कमजोर होता है।
प्रताप भानु मेहता और देवेश कपूर के मुताबिक, विचारशील निकाय के रूप में संसद का आदर्श रूप वह है, जहां कानून के लिए प्रासंगिक सभी विचार सामने आए, उन पर चर्चा हो और उसके नतीजे में मजबूत तर्क परिलक्षित हों। लेकिन ऐसा किसी भी देश में वास्तव में बहुत मुश्किल होता है। भारतीय संदर्भ में हालांकि समस्या काफी विकट है और हाल के वर्षों में स्थिति और खराब हुई है। जनमानस में संसद वैचारिक स्पष्टता की तुलना में विरोधियों से मुकाबले का स्थल है। यही वजह है कि तार्किक दलील के बजाय विघटनकारी स्थगन संसदीय विपक्ष का मुख्य औजार बन गया है। वर्ष 2016 में और खासकर शीत सत्र में ऐसा कई तरह से हुआ। पिछले 15 वर्षों में इस बार संसद के शीत सत्र में दोनों सदनों में सबसे कम काम हुआ, जिसमें मुद्रा के विमुद्रीकरण के मुद्दे पर संसद के कामकाज में बार-बार व्यवधान डाला गया। इस सत्र में आठ विधेयक संसद में पेश किए गए, जिनमें से मात्र दो पारित हुए। इसमें से कराधान कानून (द्वितीय संशोधन) को अराजकता और व्यवधानों के बीच पारित किया गया। सबसे दुखद यह है कि व्यवधान की राजनीति के चलते प्रश्नकाल की भी, जो कार्यपालिका को जवाबदेह बनाने का सबसे मजबूत औजार है, बलि दी गई।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक, व्यवधान के चलते शीत सत्र में 330 सूचीबद्ध सवालों में से मात्र दो के मौखिक जवाब राज्यसभा में दिए जा सके। यह पिछले तीन संसदों में से राज्यसभा का सबसे कम उत्पादक प्रश्नकाल सत्र रहा। जबकि लोकसभा में मात्र 11 फीसदी सवालों के जवाब ही इस सत्र में मौखिक रूप से दिए जा सके। ये आंकड़े बेहद निराशाजनक हैं।
संसद जीएसटी के अप्रत्यक्ष कराधान सुधार जैसे महत्वपूर्ण विधेयक को पेश करने और उसे पारित कराने में विफल रही, जिसके लिए काफी मशक्कत के बाद राजनीतिक सहमति बनने पर संविधान संशोधन विधेयक पारित किया गया था। जीएसटी लागू करने की मूल समय सीमा अप्रैल, 2016 तय की गई थी, पर अब अप्रैल, 2017 में भी इसके लागू होने की संभावना कम दिखती है।
ये व्यवधान बहुत पीड़ादायक हैं, क्योंकि इस तरह की देरी से हमारा देश एक बड़ा अवसर खो रहा है। जैसा कि मैंने संसद में 60वीं सालगिरह पर कहा था, 'हमारी संसद और सांसदों की सनक अभी सबसे ज्यादा है। मैं मानता हूं कि संसद की साख घटने के कुछ कारण हैं, जो भ्रष्टाचार और संवेदनहीना से परे है। एक अजीब किस्म की राजनीतिक व्यावहारिकता के जरिये आदर्शवाद को पूरी तरह से विस्थापित कर दिया गया है, जो हमारे पुरखों के विचारों और विश्वासों से मेल नहीं खाता।' दुर्भाग्य की बात है कि इनमें से कुछ बातें अब भी सच हैं।
यहां तक कि राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति ने भी संसद के कामकाज में व्यवधान की कड़े शब्दों में निंदा की है। उप राष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति ने अपनी समापन टिप्पणी में कहा कि गरिमामय विरोध के प्रतीकों को, जो संसदीय प्रक्रिया को व्यवस्थित ढंग से संचालन के लिए बेहद जरूरी है, त्याग दिया गया है। जैसा कि सोली सोराबजी ने अपने हालिया लेख में लिखा है, अगर हमारे राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति की बातों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो लोकतंत्र के लिए यह भयानक रूप से नुकसानदेह होगा और नतीजतन हमारा लोकतंत्र घिर जाएगा।
कुल मिलाकर वर्ष 2016 में संसद का प्रदर्शन एक अजीब तरह की व्यवधान की राजनीति के कारण हमारे लोकतंत्र की एक संस्था के रूप में कमतर रहा। संसद छिटपुट कानून बनाने वाले निकाय के रूप में रह गई है। यह वास्तविक बहस का समय है, यह सांविधानिक बदलावों पर वास्तविक विचार-विमर्श का समय है, जिसके कारण नाजायज व्यवधान पैदा होता है, जो संसद के कामकाज को बाधित करता है, क्योंकि संविधान में व्यवधान के कारण पैदा होने वाले ऐसे शून्य की कल्पना नहीं की गई थी। ये व्यवधान सांसदों को उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों से वंचित करते हैं और फिर संसद तथा जनता के बीच विश्वास की कमी को बढ़ाते हैं।