एक ओर गौहाटी उच्च न्यायालय ने सीबीआई के गठन को ही असांविधानिक पाया है, हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने हाई कोर्ट के फैसले पर स्थगन लगा दिया है, सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पालतू तोते की संज्ञा देकर इस स्थिति से मुक्त कराने का आग्रह किया है, वहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीबीआई की पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उसे अपराध की नई परिभाषा भी बताई है जिसके अनुसार केवल प्रक्रिया विरुद्ध होने के कारण किसी भी कार्य को आपराध की संज्ञा नहीं दी जा सकती। उन्होंने सीबीआई को सुझाव भी दिया है कि वह पूरी जांच से अपराध हुआ है, इस संतुष्टि के बाद ही अदालतों में आरोप पत्र दाखिल करे।
न्याय की पूर्व मान्यता विश्वास और तर्क असल यही रहा है कि ‘राजा कहे सो न्याउ, पासा पड़े सो दांव।’ लेकिन लोकतंत्र में यह व्याख्या बदल चुकी है, जिसमें सत्ता की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति नहीं, बल्कि नियम और कानून निर्णायक हो जाते हैं। इसे व्यक्ति का नहीं, बल्कि कानून के शासन की संज्ञा दी जाती है। उसके द्वारा तदनुसार जिस प्रक्रिया का गठन किया जाता है, वे नियम की श्रेणी में आते हैं, जिनका परिपालन करने की अपेक्षा होती है। जब सर्वोच्च न्यायालय का सीबीआई को स्वतंत्र बनाने का निर्णय आया था, तब भी यह सवाल उठा था कि कार्यपालिका, सुरक्षात्मक व्यवस्था, परिपालक, जिन्हें पुलिस और बलों के रूप में जाना जाता है, वे भी राज्य के अस्त्र ही हैं, इसलिए यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उन्हें स्वतंत्र और निर्णायक बना दिया जाए। उन्हें भी न्याय प्रक्रिया और विधि के दायरे में ही रखना पड़ेगा। इसलिए कार्यपालिका के दूसरे अंग, जिन्हें पुलिस या सुरक्षा बल कहा जाता है, भी राज्य के हितों के पोषक होंगे, लेकिन नियामक तो अंततः राज्य ही होगा। राज्य स्थायी तत्व है, लेकिन इसका संचालन किस विधि से होगा, इसके लिए सरकारों का गठन किया गया है।
जब 1975 में आपातकाल लगा, तो न्यायपालिका के वकील, अपील और दलील की शक्तियां भी प्रभावित हो गई थीं। सर्वोच्च न्यायालय को भी कहना पड़ा था कि उसके पास इस समय ऐसी शक्तियां ही नहीं हैं, जिनका प्रयोग करके व्यवस्था को ठीक कर सके। न्यायालय को हमने व्यक्तियों को फांसी देने, देश निकाला और वैयक्तिक स्वतंत्रता समाप्त करके जेलों में रखने का अधिकार दे रखा है, लेकिन वह देश की भावी व्यवस्था का स्वरूप निर्धारित करने का पात्र नहीं है। उसे मतदान के माध्यम से अपनी पसंद जाहिर करने का अधिकार तो है, लेकिन भावी व्यवस्था के स्वरूप का अधिकार नहीं है। उसे जो विवेक शक्ति दी गई है, उस पर स्वतः न्यायपालिका ने अंकुश लगा रखा है कि वह न्यायिक होना चाहिए, मनमानी नहीं।
सीबीआई को देश भर में जो दायित्व प्रमुख मामलों की विवेचना एवं दंड प्रक्रिया संचालन के लिए दिए गए हैं, उनके संदर्भ में केवल इतना कहकर संतोष किया जा सकता है कि जब भी ऐसे सवाल उठते हैं, उन्हें हल करने के लिए मामला इसी एजेंसी को सौंपने की मांग होती है। जब कोई बड़ा घोटाला होता है या कोई गुत्थी सुलझती नहीं दिखाई देती, तो मांग उठती है कि मामला सीबीआई को सौंप दिया जाए। यह भी देखने की बात है कि जब कई संस्थाएं अपनी चमक खोती दिखती हैं, तब इस एजेंसी का रसूख उतना नहीं घटा है। हां, यह जरूर कहा जाता है कि इसे सरकार विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करती है। लेकिन इसमें इस एजेंसी का दोष नहीं। कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अभी तक जो व्यवस्था है, उसमें इस एजेंसी को दूसरों से बेहतर माना जा रहा है। पर इसे सर्वोत्कृष्ट नहीं कहा जा सकता। लेकिन सर्वोच्च निर्णायक शक्ति जिन सरकारों के पास होती है, वे भी राजनीतिक स्वार्थों से मुक्त नहीं होते। इसलिए दोषों से पूर्ण मुक्ति तो संभव नहीं है। लेकिन कार्यपालिका और सैनिक या अर्द्धसैनिक बलों को अपनी इच्छा का मालिक बनाना भी तो लोकतंत्र का अपमान ही होगा। इसलिए इन्हें संविधानपरक व्यवस्था के अंतर्गत स्वतंत्रता तो दी जा सकती है, पर ऐसी नहीं, जिससे वे जवाबदेही से मुक्त हो सकें। यानी सीबीआई को अपने कामकाज का स्तर और सुधारने की जरूरत है।