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कामयाबी का दबाव: परीक्षाएं तय नहीं करतीं किरदार, परिवारों की मानसिकता बदलने की दरकार

नन्दितेश निलय, स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक Published by: Pavan Updated Mon, 29 Jun 2026 08:19 AM IST

सार

कामयाबी का दबाव अगर युवाओं को आत्महत्या तक खींच ले जाए, तो यह दुखद है। बच्चों व अभिभावकों को समझना चाहिए कि परीक्षाओं या विषयों से नहीं, बल्कि निष्ठा व अनुशासन जैसे मूल्यों से किरदार बनते हैं। जिनके पास उबरने की ताकत होती है, वही योद्धा बनते हैं।
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परीक्षाएं किरदार तय नहीं करतीं - फोटो : Freepik


लेकिन एक-दूसरे को हराती यह दुनिया कभी समझ नहीं पाती कि हमेशा सभी की जीत संभव नहीं होती! न नीट की परीक्षा में, न जेईई में, न यूपीएससी-सीडीएस में, न सिविल सर्विसेज में और न जीवन ही के अन्य प्रयासों में। कोई तमाम प्रयासों के बावजूद छूटता ही है।


तो फिर चलिए, लेख की शुरुआत उस लड़के की कहानी से, जिसे विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालय में दाखिला मिलता है। सिर्फ अपनी काबिलियत के बल पर दुनिया के किसी शीर्ष कॉलेज में अगर बच्चा दाखिला पा ले, तो उसके माता-पिता बेशक खुद को बहुत खुशकिस्मत मान रहे होंगे। लेकिन, कुछ महीनों बाद वही बच्चा अपने माता-पिता को यह सूचित करता है कि यूनिवर्सिटी के मानकों के हिसाब से बेहतरीन ग्रेड ला पाना उसके लिए दुरूह होता जा रहा है, तो क्या कोई माता-पिता अपने बच्चे की निराशा भरी बातें सुनने के लिए तैयार होंगे? और क्या माता-पिता के तौर पर हम अपने बच्चों को उस निराशा या असफलता को झेलने के लिए भी तैयार करते हैं? शायद नहीं।


यह प्रश्न इसलिए कि कई परीक्षाओं के परिणाम आने वाले समय में आएंगे, लेकिन बच्चों की बढ़ती निराशा का परिणाम तो पहले ही आ रहा है। और यह बेहद दुखद ही है।


यह विडंबना ही है कि अपने देश में बच्चों को बस ऐसे ‘सुपर टैलेंट’ या एक असाधारण प्रतिभा की तरह देखा जाता है, जो जेईई, नीट, यूपीएससी जैसे मुश्किल इम्तिहान पास कर सकते हैं। दरअसल, असल समस्या भारतीय समाज की सोच और आर्थिक व्यवस्था में है, जहां जेईई और नीट जैसी परीक्षाएं पास करना सफलता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। लेकिन, छात्रों को यह नहीं सिखाया जाता कि अगर वे असफल हो जाएं, तो उससे कैसे निपटें। माता-पिता भी चूक रहे हैं और परीक्षार्थी भी उस निराशा को संभालने में असमर्थ नजर आ रहे हैं। और उधर नतीजों की चिंता के बोझ तले दबकर, अपने 98 फीसदी को भी छात्र कमतर समझने लगता है। और चूंकि, उसे सामाजिक विज्ञान या कला में कोई भविष्य या रुतबा नहीं दिखता, इसलिए प्रतिशत का फंदा उसके चारों ओर कसता जाता है। छात्रों की निराशा, उथल-पुथल और आत्महत्याओं के बीच, परीक्षा के स्कोर और परसेंटेज का जुल्म जारी रहता है, और जो उस मुश्किल 100 प्रतिशत के निशान तक नहीं पहुंच पाते, उन्हें बेकार करार दिया जाता है। हालांकि, हमारी शिक्षा प्रणाली में यह बात बिल्कुल समझ से परे है कि परीक्षाएं असल में छात्रों से क्या चाहती हैं और उनमें किन खूबियों की तलाश करती हैं।


यह समझना मुश्किल है कि 100 फीसदी अंक और परसेंटाइल की जटिल गणनाओं पर टिकी इतनी कठिन परीक्षा किसी भी छात्र के जीवन की सफलता का अकेला आधार कैसे हो सकती है। गणित और विज्ञान की दुनिया में डूबा हुआ छात्र यह नहीं समझ पाता कि जब जिंदगी का कुरुक्षेत्र सामने आएगा, जब उसके अपने रिश्तेदार उसे घेरकर नीट और जेईई परीक्षाओं में उसकी रैंकिंग के बारे में पूछेंगे, तब क्या वह सामाजिक विज्ञान, साहित्य और दर्शनशास्त्र की समझ का इस्तेमाल कर पाएगा? उनके तीखे सवालों का जवाब देने के लिए अपने अंदर ‘कृष्ण’ को जगाने की समझ उसे कहां से मिलेगी? बुझे चेहरों के साथ अपने ही सपनों के दायरे में कैद होकर वह कोचिंग और लैपटॉप से चिपका रहता है। इसलिए, जरूरी है कि परिवार में सभी उस निराशा को आसानी से झेलने की समझ और शक्ति संजोएं। सफलता हासिल करने के लिए हमें हमेशा बहुत बड़ी मानसिक ताकत की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन, असफलता मिलने पर उससे बाहर निकलने के लिए हिम्मत, धैर्य और परिवार के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। माता-पिता को हर घड़ी अपने बच्चे को यह भी एहसास कराना चाहिए कि परीक्षा या विषय से किसी का किरदार नहीं बनता, बल्कि किरदार बनते हैं उस निष्ठा, अनुशासन और उन मूल्यों से, जो हम सभी को एक सशक्त सामाजिक प्राणी बनने की प्रेरणा देते हैं।


आखिरकार, अमेरिका के उस शीर्ष कॉलेज में बैठे उस लड़के ने उन नामी प्रोफेसरों की क्लास में बैठने का फैसला किया, जो अपने छात्रों को बी ग्रेड देने में कभी नहीं हिचकिचाते थे। लेकिन, वह लड़का हम सभी को, अपने शिक्षकों को यह संदेश भी देना चाहता था कि गणित, विज्ञान या सामाजिक विज्ञान, कला के विषय किसी व्यक्ति का किरदार नहीं बनाते, बल्कि सीखने, कुछ बेहतर करने और निरंतर कठिन मेहनत करने की जिजीविषा ही किसी शख्स की शख्सियत तय करती है। पहली बार उसे बी ग्रेड मिला, पर वह बिल्कुल निराश नहीं था और उधर उसके माता-पिता भी उसे ग्रेड्स के चश्मे से नहीं देख रहे थे। वे तो उसकी उस निराशा से उबरने वाली मानसिकता को देख सुकून पा रहे थे। उस लड़के ने विनम्रता से अपने प्रोफेसर से कहा, ‘ग्रेड के डर के बावजूद, आपकी कक्षा में शामिल होकर मुझे खुशी होगी।’


 शायद वह सभी से कहना चाह रहा था कि खुद को जेईई मेन्स, एडवांस, नीट या विदेश की किसी शीर्ष यूनिवर्सिटी में दाखिले से नहीं, या विज्ञान, सामाजिक विज्ञान या कला के विषयों की श्रेष्ठता से नहीं, बल्कि पढ़ाई के प्रति अपने प्यार, लगाव, मेहनत और समर्पण के विषय से लैस करना चाहिए। क्योंकि, जिनके पास उबरने की ताकत होती है, वही योद्धा बनते हैं। बाकी अपनी जीत के जश्न और हार के गम में डूबे रहते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि निराशा में जिसने खुद को संभालना सीखा, वही भविष्य का नायक बनता है।  - edit@amarujala.com
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