पूर्व पुर्तगाली उपनिवेश मोजांबिक, जो 1752 तक गोवा में रहने वाले पुर्तगाली गवर्नर द्वारा प्रशासित था, 1990 के दशक तक सबसे गरीब देशों में गिना जाता था। डेढ़ दशकों तक यह देश लंबे गृहयुद्ध में फंसा रहा, जिसमें दस लाख से ज्यादा नागरिकों की मौत हुई, बुनियादी संरचनाओं का भारी विनाश हुआ और करीब 50 लाख लोगों को पड़ोसी देशों में शरण लेनी पड़ी। वह गृहयुद्ध अंततः चार अक्तूबर,1992 को वैश्विक हस्तक्षेप से खत्म हुआ। जनरल पीस एग्रीमेंट पर सत्तारूढ़ दल फ्रेलिमो के अध्यक्ष चिसानो और रिनेमो दल के अध्यक्ष ढलाकामा ने हस्ताक्षर किया। संयुक्त राष्ट्र और राष्ट्रमंडल पर्यवेक्षकों की निगरानी में अक्तूबर, 1994 में वहां चुनाव हुए, जिसमें अल्बर्टो चिसानो राष्ट्रपति और ढलाकामा प्रमुख विपक्षी दल के नेता चुए गए। मोजांबिक में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान में, जो हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र का सर्वाधिक सफल शांति अभियान था, रूस, चीन एवं ब्राजील के साथ भारतीय जवानों ने भी अहम भूमिका निभाई थी।
तब से मोजांबिक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। चुनावों के जरिये राजनीतिक स्थिरता बरकरार रखी गई, खंडहर हो चुके बुनियादी ढांचों का निर्माण किया गया, आंतरिक सुरक्षा मजबूत की गई और आर्थिक उदारीकरण लागू किया गया। यूरोप, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, चीन और भारत से वहां निवेश होने लगा। आज मोजांबिक पूरे अफ्रीका में सबसे तेज उभरती अर्थव्यवस्था है।
शांति समझौते से पहले भी हालांकि असुरक्षा तथा अस्पताल व स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बीच भारतीय तेल निगम (आईओसी) और तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड (ओएनजीसी) के कुछ इंजीनियर तेल एवं गैस की तलाश में मोजांबिक की मदद कर रहे थे, बहुत से शिक्षक मोजांबिक के विश्वविद्यालयों में अध्यापन कर रहे थे। भारतीय मूल के जो लोग तीन सौ वर्ष पहले गोवा, दमन व दीव से हिंद महासागर की अशांत धाराओं को पार कर सामान्य नाव से गए थे, उनके वंशज वहां डिपार्टमेंटल स्टोर, रेस्तरां, ट्रेवल एजेंसी आदि चलाते हैं। वे अपेक्षाकृत समृद्ध हैं और हिंदू समाज की छतरी तले एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। गोवा के जीवन के बचे हुए प्रभाव के अलावा मोजांबिक में रहने वाले भारतीय मूल के लोग भारतीय व्यंजन, उत्सव, संगीत और हिंदी फिल्मों के प्रति गहरा प्यार दर्शाते हैं। वर्ष 1995 में जब मिथुन चक्रवर्ती ने राजधानी मापुतो में अपना कार्यक्रम किया था, तब तत्कालीन राष्ट्रपति चिसानो ने उन्हें 'आई एम ए डिस्को डांसर' गाने पर नृत्य करने के लिए कहा था!
तेल, गैस, कोयला एवं अन्य खनिजों की खोज और समुद्री व कृषि उत्पादों के उत्पादन में वृद्धि ने मोजांबिक को अफ्रीका में भारत का एक बड़ा भागीदार बना दिया है। 2015 में इनका द्विपक्षीय व्यापार 4.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जिसके और बढ़ने की संभावना है। ओएनजीसी विदेश और भारत पेट्रोलियम ने पहले ही वहां की एलएनजी परियोजना के 30 फीसदी शेयर खरीद लिए, जिससे भारत में गैस आएगा। निजी क्षेत्र की कुछ भारतीय कंपनियों ने मोजांबिक में कोयले की खोज की है, तो कुछ वहां से कच्चे काजू का आयात कर रही हैं। अफ्रीका कोष के तहते टाटा एवं अशोक लीलेंड बसों को मोजांबिक भेजा गया, जिसके बाद इनकी मांग वहां बढ़ी।
हमारे यहां मोजांबिक की चर्चा इन दिनों दाल के कारण भी हो रही है। देश में दाल की कीमत आसमान छू रही है, जिसे मोजांबिक से आयात करके कम किया जा सकता है। मोजांबिक से दाल की खरीद मामले में दीर्घावधि समझौते का वाकई महत्व है, जिससे वहां भारतीय दालों का उत्पादन बढ़ेगा। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान सहमति पत्र पर हुए हस्ताक्षर का स्वागत करना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा, नवीनीकृत ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के नजरिये में काफी समानता है, जो निकट सहयोग की संभावनाएं जगाता है।
ड्रग्स एवं नशीले पदार्थों की अवैध तस्करी के मुद्दे का समाधान निकालने का लाभ दोनों देशों को मिलने वाला है। नई नवीनीकृत ऊर्जा तकनीक का विकास, अनुसंधान एवं विकास और इस क्षेत्र में प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण दोनों देशों द्वारा निर्मित संस्थागत रिश्तों को आगे बढ़ा सकता है।
भारत सूचना एवं संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़कों का पुनर्वास, रेलवे एवं तेल व गैस की खोज से संबंधित परियोजनाओं में क्षमता निर्माण में मोजांबिक की मदद कर रहा है। जबकि मोजांबिक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के भारत के दावे के समर्थन के अलावा मोदी की प्रिय परियोजना अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आईओआरए की पहल का भी समर्थक है।
मोजांबिक में योग का प्रचार आसान हो सकता है। वर्ष 1994 में महेश योगी ने, जिसे वहां के पूर्व राष्ट्रपति चिसानो अपना आध्यात्मिक गुरु मानते हैं, वहां 200 योग प्रशिक्षक भेजे थे, जो 70 हजार सैनिकों को प्रतिदिन 45 मिनट योग सिखाते थे। बाद में दावा किया गया कि यह योग का ही सकारात्मक असर था, जिसने जनरल पीस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित किया!
अक्तूबर, 2015 में तीसरे भारत-अफ्रीका सम्मेलन के बाद, जिसमें 54 देशों ने भागीदारी की, प्रधानमंत्री मोदी गंभीर रूप से उसके क्रियान्वयन के पक्ष में हैं। नरेंद्र मोदी के इस दौरे के बाद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा एक नया कीर्तिमान स्थापित होगा-45 दिनों में नौ अफ्रीकी देशों की यात्रा! यह अफ्रीका के भू-राजनीतिक, भू-रणनीतिक एवं भू-आर्थिक महत्व को भारत द्वारा स्वीकार करने को रेखांकित करता है। वर्ष 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की यात्रा के बाद मोजांबिक और केन्या की यात्रा करने वाले मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं।
-लेखक मोजांबिक के राजदूत रहे हैं