भारत के नन्हें पड़ोसी नेपाल का दुर्भाग्य यह रहा है कि यहां राजशाही के खात्मे के बाद आए लोकतंत्र का खूब उपहास हुआ। अचरज की बात है कि 2008 में जिस खास बात के लिए संविधान सभा का चुनाव हुआ था, उसे दरकिनार कर वहां सत्ता हथियाने की होड़ लगी हुई थी।
और अब वहां फिर से चुनाव होने हैं, लेकिन यह विडंबना ही है कि संविधान सभा के पिछले कार्यकाल में संविधान का एक हर्फ तक नहीं लिखा जा सका। पिछली बार कार्यकाल पूरा होने के बाद भी संविधान सभा के सदस्य सत्ता से तभी हटे, जब न्यायपालिका सख्त हुई। हालात यह है कि नई संविधान सभा का चुनाव कराने के लिए नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को सत्ता अपने हाथ में लेनी पड़ी।
सब कुछ ठीक रहा, तो वहां 14 नवंबर को संविधान सभा के दूसरे चुनाव हो जाएंगे। सारे राजनीतिक दलों के नेता काठमांडू से बाहर निकलकर अपने-अपने क्षेत्रों में जम गए हैं। कुछ बड़े नेता देश के बाहर भी हैं। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष सुशील कोइराला सहित अन्य नेपाली नेता भारत का भ्रमण कर लौट चुके हैं। भारत ने नेपाली नेताओं को चुनाव में सहयोग देने का भरोसा दिया है।
चुनाव का विरोध कर रहे लगभग सारे दल अब चुनाव के लिए सहमत हो गए हैं, लेकिन माओवादियों से अलग हुआ मोहन किरन वैद्य गुट अब भी विरोध पर अड़ा हुआ है। नेपाल में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति से लेकर राजनीति के हर जानकार को उम्मीद है कि वैद्य गुट भी चुनाव के लिए अंततः तैयार हो जाएगा।
वैद्य पहले प्रचंड के निकटवर्ती थे। उन्हें माओवादियों से निपटने का तौर-तरीका अच्छी तरह मालूम है। वैद्य जिन मुद्दों को लेकर चुनाव का विरोध कर रहे हैं, उसके समर्थन में बहुसंख्यक नेपाली जनता भी है। वैद्य का कहना है कि ढाई साल के लिए संविधान सभा का चुनाव हुआ था और पांच साल में भी संविधान नहीं बन सका। यह नेपाली जनता के साथ छल है। वह कहते हैं कि चुनाव के पहले राजनीतिक दलों में संविधान की रचना और उसके ढांचे के लिए आम सहमति बन जाए, फिर चुनाव हो। ताकि चुनाव के बाद संविधान लेखन व अन्य कुछेक मुद्दों पर मतभेद न रह जाए।
इससे इतर नेपाली राजनीतिक दल चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं। चुनाव के बाद परिणाम क्या होता है, यह कह पाना फिलहाल मुश्किल है, लेकिन ऐसा लगता है कि माओवादियों को सत्ता से दूर रखने के लिए नेपाली कांग्रेस और मधेशी दलों में तालमेल होगा। नेपाल में मधेशियों की लड़ाई के लिए 1990 में गठित सद्भावना पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र महतो ने कहा है कि नेपाली कांग्रेस या कोई भी मधेशी दल अकेले कुछ नहीं कर सकता, इसलिए मतभेद भुलाकर मधेशी दलों और नेपाली कांग्रेस में तालमेल जरूरी है।
नेपाल में प्रचंड के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी का राजनीतिक आधार भारत विरोध है। इस पार्टी की यूथ विंग यंग कम्युनिस्ट लीग ने नेपाल में तराई से लेकर पहाड़ तक को भारत विरोध के नारों से रंग दिया है। नेपाली राजनीति के विश्लेषक व मानवाधिकार कार्यकर्ता मंगल प्रसाद गुप्त का कहना है कि नेपाल में माओवादियों का भारत विरोध फार्मूला कामयाब नहीं होगा। कारण नेपाल की करीब एक करोड़ आबादी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से जीविकोपार्जन के लिए भारत पर निर्भर है। भारत ने नेपाल को बराबरी का दर्जा दिया है। भारत में नेपालियों को वे सारी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं, जो भारतीयों को हैं।
नेपाल के प्रति भारत की उदारता ही है कि अंग्रेजों द्वारा गठित गोरखा रेजीमेंट को भारत ने आज भी बरकरार रखा है। नेपाल की जनसंख्या का 4.5 प्रतिशत जीविका के लिए भारतीय सैन्य सेवाओं पर निर्भर है। उनका कहना है कि नेपाल की करीब पौने तीन करोड़ आबादी में से एक करोड़ आबादी किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए काफी है।
बहरहाल नेपाल के सियासी दलों में चुनाव को लेकर भले ही सरगर्मी हो, लेकिन वहां की आम जनता इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है। वह निराश दिख रही है, लेकिन यह उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए कि संविधान सभा के दूसरे चुनाव के बाद नेपाल में कोई नई राह निकलेगी।