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जमीन से दूर होता विपक्ष

Sun, 09 Apr 2017 10:01 AM IST
रशीद किदवई
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रशीद किदवई
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खंडित और सिद्धांतविहीन विपक्ष इन दिनों हर मुद्दे पर सिर्फ विरोध, विरोध, विरोध की भाषा बोल रहा है, जो एक जीवंत लोकतंत्र में स्वस्थ संकेत नहीं है। बेशक यह सही है कि विपक्ष की मुख्य भूमिका सरकार से सवाल पूछना और उसे जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है, लेकिन उसकी दूसरी बड़ी भूमिका है सरकार के काम का विकल्प सुझाना, ताकि जनता को राजनीतिक बहस का लाभ मिल सके, लेकिन मतभेदों के बीच उसकी दिशा गुम हो गई है।
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव संपन्न हुए एक महीने बीत चुके हैं। लेकिन ऐसा कोई विपक्षी नेता नजर नहीं आ रहा है, जो केंद्र की उस नरेंद्र मोदी सरकार को घेर सके, जो भारतीय राज्यों की शक्तियों का इस तरह विस्तार कर रही है, जैसा दशकों से नहीं देखा गया। उदाहरण के लिए, वित्त विधेयक को देखा जा सकता है, जिसमें 40 से ज्यादा संशोधन किए गए थे, जो अब तक नतीजे से बहुत दूर हैं। सूचना के अधिकार को कमजोर करने की कोशिश और सूचनाओं तक पहुंच को और ज्यादा महंगी बनाना एक अन्य उदाहरण है कि कैसे विजेता मोदी हर चीज को मुश्किल बना रहे हैं।

भारतीय कंपनियों को अपनी पसंदीदा राजनीतिक पार्टी को ज्यादा धन दान करने की इजाजत पर कुछ सवाल तो उठे, लेकिन ऐसे कई अन्य मुद्दे हैं, जिनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया है। उदाहरण के लिए, ट्रिब्यूनल या अर्धन्यायिक निकाय से संबंधित एक संशोधन मोदी सरकार को न्यायपालिका से इजाजत लिए बगैर ट्रिब्यूनल सदस्यों की योग्यता, नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन एवं भत्ते, इस्तीफा, हटाने और सेवा की अन्य शर्तों के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
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यह समझने की बात है कि विपक्षी दलों के पास उतने संसाधन नहीं हैं, जितने सरकार या कार्यकारी के पास हैं। लेकिन वैसा ही परिमाण प्राप्त करने के लिए दोगुना कड़ी मेहनत करने के बजाय राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, मायावती, नवीन पटनायक, सीताराम येचुरी व अन्य विपक्षी नेता अपने मैदान की रक्षा में व्यस्त हैं। येचुरी और मायावती के लिए विपक्षी एकता का मतलब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी द्वारा लिटमस टेस्ट के रूप में राज्यसभा में उनकी वापसी सुनिश्चित करना होगा।

इस अर्थ में व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा, अपना मैदान बचाने का संघर्ष, दृष्टि की कमी और भविष्य के लिए रोडमैप विपक्ष के सामने बहुत बड़ी चुनौतियां हैं, जो 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले आदर्शवादी महागठबंधन का उभार नहीं देख सकता है। कांग्रेस लगातार बदहाल स्थिति में है।

गैरभाजपा और गैरराजग गठबंधन को एक साथ लाने के लिए राहुल नेतृत्व करने में अक्षम लग रहे हैं। उनकी अनुभवहीनता एक बात है, लेकिन मोदी सरकार को घेरने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से जानकारी पाने में उनकी अक्षमता बिना किसी स्पष्ट व्याख्या के चौका रही है। देश की इस सबसे पुरानी पार्टी के पास प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, डॉ. मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम, शशि थरूर, एके एंटनी, सुशील कुमार शिंदे, पृथ्वीराज चह्वाण, जयराम रमेश, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ और बुद्धिमान सलाहकारों से लेकर मिलिंद देवड़ा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद जैसे युवा नेता भी हैं। फिर भी राहुल को सलाह देने या सहयोग करने के लिए संसदीय बोर्ड या नई कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में कोई पुनरुद्धार नहीं किया गया है।

प्राइम टाइम टीवी बहस में काम्या मलहोत्रा, शमा मोहम्मद, खुशबू जैसे नौसिखुए और संजय झा तथा पूनावाला भाइयों को देखना परेशान करता है, जो अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए संघर्ष करते रहते हैं, जबकि सिंधिया, चह्वाण और देवड़ा को ध्यानमगन होकर सुना जा सकता है। हैरानी की बात है कि अन्यथा मुखर रहने वाले इन वक्ताओं को हर शाम टीवी स्टूडियो में उस मंच का बेहतर उपयोग करने के लिए क्यों नहीं भेजा जाता है?

मान लीजिए कि लोकसभा में भाजपा-राजग के बहुसंख्यक नेता विपक्ष को मोदी शासन को घेरने नहीं दे रहे हैं, लेकिन सवाल उठता है कि राहुल या अन्य नेता लोगों के साथ सीधे संपर्क स्थापित करने के लिए रैलियों और जनसभाओं का सहारा लेने में क्यों शरमाते हैं? क्या हमने मान लिया कि राहुल केवल एक चुनाव प्रचारक के रूप में दिखेंगे? यदि यह धारणा है कि दक्षिणपंथी तत्व मतदाताओं को प्रभावित करते हैं, तो कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के दिग्गज नेता विभिन्न मठो, अखाड़ों और ट्रस्टों के प्रमुखों से मिलने में क्यों कतराते हैं? निश्चित रूप से सभी धार्मिक निकाय विहिप या आरएसएस के इशारे पर नहीं चलते हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी का तर्क है कि सोनिया और राहुल की समाज में गहरी पैठ है, तो उसे दिखाने और स्थापित करने की जरूरत है।

शरद पवार की चतुराई और सौदेबाजी करने में महारत को देखते हुए यह कद्दावर मराठा विश्वसनीय नहीं है। दिन-ब-दिन नीतीश कुमार की राजग के साथ बढ़ती निकटता ने मोदी-विरोधी मोर्चे में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका से उन्हें बाहर कर दिया है। अखिलेश बुआ मायावती के साथ संभवतः कुछ गर्मजोशी दिखा सकते हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी के भीतर के अंतर्कलह ने स्वयं अखिलेश को पार्टी के भीतर कमजोर कर दिया है। अखिलेश यादव बुजुर्ग मुलायम सिंह के साथ फिर से शांति स्थापित करने को बेताब हैं, जिन्हें ज्यादातर गैरराजग नेताओं ने नकार दिया है। यहां तक कि स्वास्थ्य संबंधी अटकलों और अमेरिका की यात्रा के कारण नवीन पटनायक की बीजद पर पकड़ भी घटती जा रही है। यह भी महत्वपूर्ण है कि विपक्षी नेता जनता की बातों, जरूरतों और इच्छाओं पर अपनी आंख-कान खुले रखें, क्योंकि सरकार द्वारा वायदा पूरा न करने की समस्याएं अक्सर सामने आती हैं।
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