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एनआरसी : जवाब से ज्यादा सवाल, इसका परिणाम या अंत क्या होगा?

संजय हजारिका Published by: संजय हजारिका Updated Fri, 04 Oct 2019 03:16 AM IST
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एनआरसी - फोटो : a

अगर आप सोचते हैं कि भारतीयों और विदेशियों (यहां बांग्लादेशी पढ़ें) की निशानदेही करने के लिहाज से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) एक जटिल काम था, तो इसका परिणाम या अंत क्या होगा, इसके बारे में कोई स्पष्टता न होने के कारण यह और भी जटिल एवं अप्रिय हो गया है।



उदाहरण के लिए, अब 19 लाख से ज्यादा लोग सूची से बाहर हो गए हैं और प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई (जो असमी हैं) के नेतृत्व में इस प्रक्रिया का संचालन करने वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने घोषणा की है कि 31 अगस्त की सूची अंतिम है। विदेश और गृह मंत्रालय, दोनों के माध्यम से भारत सरकार ने घोषणा की है कि (मई में हुए लोकसभा चुनाव से पहले और बाद में भाजपा के नेताओं एवं मंत्रियों ने जो भी घोषणा की हो, उसके बावजूद) जो भी व्यक्ति सूची से बाहर है, उसे सरकारी एजेंसियों-जिला एवं राज्य कानूनी सहायता प्राधिकरण द्वारा कानूनी सहायता प्रदान की जाएगी और उन्हें सूची में शामिल करने का भरसक प्रयत्न किया जाएगा!


अदालत में यह साबित करने का, कि कोई भी गैर-राष्ट्रीय या गैर-नागरिक नहीं है-मतलब है एक लंबी और यातनापूर्ण प्रक्रिया, जिसमें सबसे पहले विदेशी ट्रिब्यूनल में अपील करने की जरूरत है, (जो कुछ महीने पहले मात्र सौ थे, और अब बढ़कर 222 हुए हैं) और फिर अगर वह विफल रहता है, तो उच्च न्यायालय में अपील करना और अंत में सुप्रीम कोर्ट में अपील करना शामिल है।


यह स्पष्ट नहीं है कि इस प्रक्रिया के दौरान अगर ट्रिब्यूनल ने किसी व्यक्ति के 'विदेशी' होने की पुष्टि कर दी, तो क्या उसे बंदी शिविर (डिटेंशन कैंप) में ले जाया जाएगा, जैसा कि अतीत में कारगिल की लड़ाई में भाग लेने वाले सेना के अधिकारी सलाहुद्दीन वाले मामले में हुआ था। उन्होंने सेना एवं देश की सेवा की थी, फिर उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया, इसलिए वह बंदी शिविर में रखे जाने के पात्र थे! हालांकि कई बंदी शिविर हैं, जो मौजूदा जेलों से बेहतर नहीं हैं, जिसमें एक हजार से ज्यादा लोग दयनीय स्थितियों में रहते हैं। एक ही शौचालय वाले छोटे से सेल में वे लोग बिना किसी उम्मीद के अपने दिन काट रहे हैं।


कुछ भी स्पष्ट नहीं है कि सभी कानूनी उपाय खत्म होने के बाद क्या होगा, क्योंकि निर्वासित करने संबंधी कुछ दलों का साहसी दावा सफल नहीं होने वाला है। इसकी वजह है कि यह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा और द्विपक्षीय समस्या है और हमें घरेलू कानूनों का नहीं, अतंरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना होगा।


निर्वासित न किए जा सकने की कई वजहें हैं पहला, बांग्लादेश के साथ कोई निर्वासन संधि नहीं है। दो, ढाका ने यह मानने से इनकार किया है कि बांग्लादेशी अवैध रूप से सीमा पार कर भारत जाते हैं। इसके बजाय ढाका का यह कहना है कि भारत बंगाली मुसलमानों को बाहर निकालना चाहता है। तीसरा, दुनिया भर के कई देश इस बुनियादी आधार को मानते हैं कि अगर अवैध प्रवासन का कोई मुद्दा है, तो इससे निपटने का एकमात्र तरीका बेहतर सीमा प्रबंधन और अवैध घुसपैठ करने वालों को सीमा पर धकेलना है।


इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट को निर्णय लेना बाकी है और कम से कम एक विरोधाभास है, जो अनसुलझा है। आइए, कानून के एक महत्वपूर्ण मुद्दे को देखें, जो अब भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है। और यह संविधान पीठ के समक्ष है-ये एक प्रश्न नहीं, बल्कि तेरह हैं और उसमें एक सवाल यह भी है कि असम, जो भारत का एक राज्य है, वहां नागरिकता कानून के संशोधन (जिसके तहत कोई व्यक्ति नागरिकता का दावा कर सकता है) से अलग नागरिकता उपखंड क्यों है। यह असम समझौते से बाहर निकला है, जिस पर 1985 में भारत सरकार और असम सरकार और आंदोलनकारी समूह ने दस्तखत किए थे, जो विदेशियों (फिर बांग्लादेशी पढ़ें) का पता लगाने और उन्हें बाहर निकालने की मांग कर रहे थे। उस समझौते में, दो प्रमुख बिंदु थे-एक का संबंध 75,000 लोगों (ज्यादातर पूर्वी पाकिस्तान के हिंदू, जो 1966-71 के बीच सीमा पार से आए थे) के मताधिकार से संबंधित था, जिन्हें दस वर्षों की अवधि पूरी होने पर मतदाता सूची में शामिल करने की बात थी। और दूसरा बांग्लादेश के निर्माण के दिन यानी 25 मार्च, 1971 के बाद आए लोगों का पता लगाने और निर्वासित करने से संबंधित था।
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लेकिन कटऑफ की इस तिथि से एक नई समस्या पैदा हो गई है, नागरिकता कानून के अंतिम संशोधन में शेष भारत में नागरिकता 1992 पर आधारित है। इसलिए नागरिकता के मामले में असम में जो कानून लागू होता है, वह शेष भारत में लागू नहीं होता और शेष भारत में जो कानून लागू होता है, वह असम में लागू नहीं होता।


कोई भी तार्किक व्यक्ति पूर्वोत्तर के विरोधाभासों को देख-परख सकता है, जहां 260 नस्लीय समुदाय के और दुनिया के तमाम धार्मिक समुदायों के लोग रहते हैं। चालीस साल से पहचान और नागरिकता के मुद्दे पर आंदोलन और संघर्षरत असम में एनआरसी की शुरुआत पिछली कांग्रेस सरकार के समय हुई थी। लेकिन भाजपा के दौर में इसने जोर पकड़ा। हालांकि इसके नतीजे ने भाजपा को परेशान कर दिया है, जो मान बैठी थी कि बड़ी संख्या में बंगाली मुसलमान सूची से बाहर होंगे।


इसलिए अगर आप उलझन में हैं, तो आपको उसका अधिकार है। जब असम जैसे छोटे, मगर जटिल राज्य में एनआरसी को ठीक से लागू नहीं किया जा सकता, तो पश्चिम बंगाल और देश के अन्य हिस्सों में इसे कैसे लागू किया जा सकता है? ऐसे में भयानक स्थिति पैदा हो सकती है और बंदी शिविरों को भी स्वीकार्य नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इससे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है, जिसमें कहा गया है कि भारत में नियत प्रक्रिया को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन एवं स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता।


उचित प्रक्रिया ने एनआरसी के नतीजे को बदल दिया है। इसे शुरू करवाने वाले सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि 1971 और 1992 के बीच के अंतराल का क्या होगा। अगर 1971 से अलग किसी तिथि को मंजूरी दी गई, तो एनआरसी की पूरी प्रक्रिया ही व्यर्थ हो जाएगी।


-पूर्वोत्तर मामलों के विशेषज्ञ और कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव के निदेशक। 

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