गांधी जी इसलिए लोकनायक हैं कि उन्होंने भारत की ताकत पहचान ली थी। भारत की यह ताकत आध्यात्मिक है। उसे उन्होंने रूढ़ धार्मिकता से अलग रखा और तब उन्होंने देखा कि हथियार विहीन होकर भी भारत ताकतवर देश है। गांधी जी की अहिंसात्मक दृष्टि वस्तुतः एक मानवीय आविष्कार है। उसी का उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में प्रयोग किया। प्रयोग उनका बीज शब्द है। इसलिए उन्होंने अपने जीवन के साथ भी प्रयोग किया।
इस अवसर पर हमें अलबर्ट श्वैट्सर का स्मरण करना चाहिए कि उन्होंने भी तमाम सुविधाओं को त्याग कर कोढ़ग्रस्त लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित किया था। इसे श्वैट्सर ने ‘जीवन समर्पण’ कहा था। गांधी जी ने देखा कि भारत बुरी तरह से रोगग्रस्त है। उसका पहला रोग था परतंत्रता। अन्य कई प्रकार के रोगों से भी वह ग्रस्त था। उनमें से एक प्रमुख रोग है गरीबी। गांधी जी की स्वराज्य परिकल्पना के पीछे अधिकार विकेंद्रीकरण की ही बात थी।
जब उन्होंने यह कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, तो उसका मूल आशय दरिद्रता नियोजन से संबंधित था। कृषि का विकास और गांवों का उत्थान उनका लक्ष्य था। अतः उनका संघर्ष बहुआयामी था। वह आजादी का संघर्ष था, भारत के गरीब लोगों के लिए किया गया संघर्ष था, जाति विहीन समाज को प्रतिष्ठित करने के लिए किया गया संघर्ष था, तथा सर्वधर्म समभावना के लिए जीवन को समर्पित करके नवमानव की नई संस्कृति को रोपने के लिए किया गया संघर्ष था।
गांधी जी का संघर्ष समग्र संघर्ष था। गांधी जी एक अति सरल मनुष्य थे। भारत के महान ऋषियों की शक्तिशाली परंपरा को ही उन्होंने आगे बढ़ाया था। सबसे पहले उन्होंने व्यक्तिगत संपत्ति का त्याग किया। मनुष्य की धार्मिकता ही उनके लिए भक्ति थी। उसी से उन्होंने विश्वधर्म की परिकल्पना की थी। यह कोई यूटोपिया नहीं है। उसमें समाज के ‘अंतिम जन’ को उन्होंने प्रमुखता दी थी। एक ऐसा भारत, जो कि सही मायने में ‘कल्याणकारी राज्य’ हो।
रूढ़िवादी धर्म, संकुचित नस्लवाद और आर्थिक शोषण से मुक्त विश्व का सपना ही उन्होंने देखा था। आज जब हम अपने देश को देख रहे हैं, तो हम पाते हैं कि गांधी जी अंधेरे में कहीं विलीन हो गए हैं। हिंदी के प्रबुद्ध कवि मुक्तिबोध ने अपनी लंबी कविता में (अंधेरे में) विलीन हो रहे गांधी का ही जिक्र किया है। मुक्तिबोध के कविता संदर्भ को हमें गंभीरतापूर्वक देखना है। हमारे प्रमुख शहरों के चौराहों पर उनकी प्रतिमा दिखती है या हमारी प्रमुख संस्थाओं के नाम गांधी जी के नाम पर हैं। लेकिन सवाल तो बाकी रह जाता है-गांधी जी कहां हैं?
स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम दौर में भारत का एक नया स्वरूप विकसित हो रहा था। कट्टरवाद से मुक्त धर्म ही यहां स्वीकृत था; घोर जातिवाद मिटता जा रहा था। स्वतंत्रता एक मूल्य के रूप में स्वीकृति प्राप्त कर रही थी। उनके दो प्रमुख सिद्धांत-स्वराज और अहिंसावादी दृष्टि सार्वभौमिक स्तर पर विचारणीय हो गए थे। यह हमारा नया भारत था और इसी का सपना गांधी जी ने देखा था। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद जो योजनाएं बनीं, वे उनके दर्शन के अनुकूल नहीं थीं।
जिस धार्मिक एकता के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर किया था, वह अर्थहीन साबित हुआ और धार्मिक एकता के स्थान पर धार्मिक कट्टरवाद ने उनके सीने को छलनी कर दिया। गांधी जी नहीं रहे। दुखद स्थिति यह है कि उनका परिकल्पित भारत भी नहीं रहा।
यद्यपि हम हर साल दो अक्तूबर को गांधी जयंती मनाते हैं, हर सभा में उनके प्रिय प्रार्थना-गीत रटते हैं, फिर भी गांधी जी का भारत गायब है। जाति केंद्रित समाज और जाति केंद्रित चुनावी रणनीतियों ने भारत की आत्मा को नष्ट कर दिया है। धार्मिक असहिष्णुता आज भारत की खुली मानसिकता को दबोच रही है। ऐसे में, स्वस्थ नागरिक बोध से युक्त बृहत्तर समाज के हृदय में यह सवाल उठ खड़ा होता है- गांधी जी का भारत कहां है?
(पूर्व प्रतिकुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)