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नई सुबह का सूरज नया संदेश लाएगा

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लेखन - फोटो : a

वर्ष 2019 में मेरे जीवन में एक बड़ी दुखद घटना घटी। मार्च में मेरी धर्मपत्नी श्रीदेवी का निधन हो गया। उसके बिना मेरी कविता कुछ भी नहीं है। मेरे साहित्यिक जीवन में उसका बड़ा योगदान था, उसी ने मेरी कविताओं को शक्ति और जीवन दिया। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से मेरी कविताओं पर उसका प्रभाव रहा है। मेरी कविताओं के जागरूक पाठक यह बात भलीभांति जानते हैं। लेकिन वर्ष 2019 में ही मेरे जीवन में एक आनंद का क्षण भी आया, जब मुझे भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई। मुझे नहीं लगता कि मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह सही और उत्कृष्ट है। मलयालम साहित्य में मुझसे कई बड़े और बेहतर कवि हुए हैं, जिन्हें यह सम्मान नहीं मिला, लेकिन मुझे मिला, इसलिए मैं बहुत खुश हूं। वर्ष 2019 की इन दोनों घटनाओं से एक बात मेरी समझ में आई कि हर दुख के बाद सुख का क्षण आता है और हर सुख के बाद दुख का भी क्षण आता है। यह जीवन का शाश्वत सत्य है, जो 94 वर्ष की आयु में मैंने अपने जीवन से ही सीखा है। इसलिए लोगों को दुख से घबराना नहीं चाहिए। हो सकता है कि नववर्ष की नई सुबह का सूरज कोई सुखद संदेशा लेकर आए।



उम्र के इस पड़ाव पर जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो पाता हूं कि बचपन में मुझे परंपरागत संस्कृत शिक्षा मिली। संस्कृत शिक्षा का काल बेहद स्मरणीय है। बचपन में ही मुझे कालिदास की रचनाओं को पढ़ने का अवसर मिला, संभवतः इसलिए मेरी कविताओं में उनकी कविताओं का संस्पर्श और बिंब विधान देखने को मिल सकता है। मैं हायर सेकेंडरी तक ही पढ़ाई कर सका। मैं कॉलेज-विश्वविद्यालय में पढ़ाई नहीं कर सका, लेकिन उसका मुझे बहुत अफसोस नहीं है। बचपन से ही मैं कविताएं लिखने लगा था। बचपन में मैंने पहली कविता की पंक्ति मंदिर की दीवार पर लिखी। असल में कुछ लोग मंदिर की दीवारों पर अश्लील बातें लिखते और अश्लील चित्र बनाते थे। यह देखकर मेरा बाल मन शांत न रह सका, वह विद्रोही हो उठा। मेरी काव्य-पंक्ति का आशय था कि मंदिर की दीवारों को गंदा करने वालों को ईश्वर सजा देगा। उस पंक्ति के नीचे मैंने अपना  नाम अच्युतन उण्णि भी लिखा था। लेकिन अनुष्टुप छंद में लिखी उस पंक्ति को देखकर मैं स्वयं चकित हो उठा। सात-आठ साल के हमउम्र बच्चों ने मुझे बधाई दी थी।


बचपन में ही बेमतलब के रीति-रिवाजों में परिवर्तन लाने की कामना मेरे मन में प्रबल हो उठी। समाज में फैली गलत एवं रूढ़िवादी कुप्रथाओं के खिलाफ मैं लिखने लगा। किसी मोह के कारण नहीं, बल्कि अपने हृदय की ओर झांककर ही मैंने हमेशा लिखा है। यही मेरा स्वत्व है। जीवन में मुझे कई मार्गदर्शक मिले। काव्य सृजन में इडेश्शरी गोविंदन नायर मेरे मार्गदर्शक थे, जिन्होंने मुझे सिखाया कि साहित्य जीवन में आंसुओं की खोज है। सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए वी.टी. भट्टथिरिपाद से सतत प्रेरणा मिली। मैंने बचपन से ही यह महसूस किया है कि जीवन के प्रति दिखाई गई दया सबसे बड़ी विचारधारा है। लेकिन आज इंसान ज्यादा स्वार्थी हो गया है। स्वार्थ अन्य सभी भावनाओं को दबा देता है। लेखक इसलिए मारे जाते हैं, क्योंकि उनका लेखन शक्तिशाली है। इसे बिल्कुल भी सही नहीं ठहराया जा सकता है।


मेरा लेखन हमेशा भारतीय संस्कृति के आसपास केंद्रित रहा है। मैं बिना प्रेरणा के सिर्फ पैसों के लिए कविताएं नहीं लिख सकता। कोई कविता तभी मन में बसी रह सकती है, जब उसमें कथात्मकता हो। गेयता कविता को सिर्फ सुंदर बना सकती है। कविता और कहानी, दोनों का मूल उद्देश्य आनंद है। इस आनंद का लेन-देन तब होता है, जब कवि को लिखते हुए आनंद की अनुभूति होती है और पाठक को पढ़ते वक्त। कुछ ऐसी कविताएं भी थीं, जो मेरी नींद में खलल डालती थीं और एक ऐसा वक्त भी था, जब हमें नियंत्रित करने वाली शक्ति ने मुझसे लिखवाया। हालांकि शारीरिक अस्वस्थता ने भी मुझे परेशान किया। मैं निरंतर नए-नए साहित्य पढ़ता रहता हूं। दूसरों से पढ़वाकर सुनने की मुझे आदत नहीं है। अब भी अच्छी किताबें पढ़ने का मेरा मन है।


मलयालम में मेरी कई कृतियां प्रकाशित हुई हैं, उनमें से कुछ कृतियों के अनुवाद भारत की विभिन्न भाषाओं में हुए हैं। हिंदी पाठकों तक उन कृतियों को पहुंचाने वाले अनुवादकों में यू.के.एस. चौहान, वी.के.हरिहरन उण्णितान और डॉ आरसु हैं। हमारे देश की सारी भाषाओं का साहित्य मिलकर भारतीय साहित्य बनता है। एक भाषा से दूसरी भाषा में परस्पर अनुवाद भारतीय साहित्य के समग्र विकास के लिए आवश्यक है। ज्ञानपीठ पुरस्कृत विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों को आज सारी भाषाओं के पाठक जानते हैं। अनुवाद ने इसे सुगम बनाया है। अमृता प्रीतम, उमाशंकर जोशी, वी. एस. खांडेकर, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकारों से विभिन्न प्रसंगों में मेरा परिचय-संपर्क हुआ था। उनकी कृतियों के अनुवाद पढ़कर मेरा मानसिक विकास हुआ।


अब हम एक नए वर्ष 2020 में कदम रख रहे हैं। खुशी की बात है कि साहित्य के क्षेत्र में उदीयमान लेखक सामने आ रहे हैं। उनकी रचनाओं में विभिन्न विषय और विचार आ रहे हैं। हमारे देश में अनेक भाषाएं हैं। भाषा चाहे जो भी हो, साहित्य मानवता के उत्कर्ष का रास्ता खोले। साहित्यकारों को अपने हृदय में झांकना चाहिए। तब उनकी कृतियों में मानवमंगल की प्रकाश रश्मियां आएंगी। साहित्यकारों को देश की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने की तरफ ध्यान देना चाहिए। तुलसीदास, कृतिवास, पंपा, कंबर, एझुताच्छन, माधव कांदली और रंगनाथ विभिन्न भाषाओं के रामायणकार थे। उनकी भाषाएं अलग-अलग थीं, लेकिन एक ही चेतना और मूल्य पर वे बल दे रहे थे। उनकी कृतियों के अनुवाद और पुनराख्यान विभिन्न भाषाओं में आ रहे हैं। उम्मीद है कि नए वर्ष में भी भाषायी सौहार्द से सांस्कृतिक सद्भाव को टिकाऊ बनाए रखने के लिए साहित्यकार कोशिश करते रहेंगे।


-ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मलयालम कवि अक्कितम अच्युतन नंबूथिरी के साथ केंद्रीय विश्वविद्यालय, केरल के प्रोफेसर डॉ. आरसु की अमर उजाला के लिए विशेष बातचीत पर आधारित।

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