उत्तर प्रदेश में चार चरण के मतदान हो चुके हैं। इन चुनावों में हम नेताओं की नई पीढ़ी देख रहे हैं। यह उस पीढ़ी से बहुत दूर है, जिसने आजादी की लड़ाई या आपातकाल का समय देखा है। कुछ ने देखा भी होगा, तो वे इतने छोटे रहे होंगे कि इस दौर की बातें सिर्फ किस्सों में ही सुनी होंगी। इनमें से बहुत से ऐसे हैं, जो अपने माता-पिता या खानदान की विरासत को संभालने राजनीति में आए हैं। बिल्कुल वैसे ही, जैसा कि उद्योग जगत में होता है या कि खेती-किसानी में कि दादा-पिता की जमीन घर के बेटे-बेटियों, नाती-पोतों को ही मिलती है। राजनीति भी तो एक प्रकार से वोटों की खेती ही है। जिसकी हर पांच साल में अपने-अपने हितों की खातिर फसल काटनी पड़ती है।
अरसा पहले कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाया जाता था। नेहरू के बाद इंदिरा, उनके बाद राजीव, फिर सोनिया, राहुल, प्रियंका। आपातकाल के दौरान और उसके बाद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन में कांग्रेस का विरोध वंशवाद के कारण भी किया गया था। उसी दौर में कांग्रेसी नेता देवकांत बरुआ ने इंदिरा गांधी को भारत का पर्याय बताते हुए कहा था –इंदिरा इज इंडिया। उस समय 1977 में दिल्ली की एक विशाल सभा में तमिलनाडु के प्रखर पत्रकार दिवंगत चो रामास्वामी ने इंदिरा इज इंडिया कहने का खूब मजाक उड़ाया था। जयप्रकाश के आंदोलन में जो लोग अग्रिम पंक्तियों में थे, उनमें से कई बड़े नेता बने और आज तक हैं। जिस वंशवाद के विरोध की लहर पर वे सवार थे, उन्होंने उसे अपने पक्ष में मोड़ा और अपने-अपने कुनबे को आगे कर दिया।
आज भी कई लोग वंशवाद को लेकर कांग्रेस पर हमला बोलते रहते हैं, लेकिन इनमें से ही बहुत से मौका मिलते ही अपने, बेटे, बेटी, पत्नी, बहुओं, भाभियों, भतीजों-भतीजियों को टिकट दिलवा देते हैं। बल्कि यह घोषणा करने पर भी कि अपने रिश्ते-नातेदारों के लिए टिकट न मांगें, अंततः जीत रिश्तों और रिश्तेदारों की ही होती है।
इस चुनाव में यह सोच भी काम कर रहा है कि इस बार लगभग एक करोड़ मतदाता ऐसे हैं, जो पहली बार वोट दे रहे हैं। ये पुरानी पीढ़ी के नेताओं के मुकाबले नई पीढ़ी की ओर अधिक आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। शायद यही वजह है कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव को इन युवाओं के आइकन के तौर पर पेश किया गया और कैच लाइन दी गई-यूपी के लड़के। हालांकि दोनों ही चालीस के पार हैं।
नई पीढ़ी के ये युवा नेता-नेत्रियां उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, कई विदेशों में पढ़ाई कर चुके हैं, स्मार्ट हैं, धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते हैं। घर वालों के कारण शक्ति संपन्न और धनवान तो हैं ही। बड़ी गाड़ियों और हवाई जहाजों में चलते हैं। अक्सर चिढ़ने और भंवें चढ़ाने के बजाय हंसते-मुस्कराते दिखते हैं। और किसी भी समस्या को चुटकी में हल कराने का सपना जगाते हैं।
आजादी के समय के बहुत से बड़े नेता गांधी, नेहरू, अंबेडकर आदि विदेशों में पढ़े थे। देश को समझ सकें, इसके लिए गांधी ने पूरे देश की रेलगाड़ी से यात्रा की थी। फिर बीच में ऐसी पीढ़ियां आईं, जो भारत में रहकर पढ़ी, बड़ी हुई थीं। केंद्र की कांग्रेस सरकार के विरुद्ध हमेशा मुखर रही थीं और तमाम किस्म के आंदोलन की अगुवाई भी कर चुकी थीं। अब इन्हीं नेताओं के बाल-बच्चे नए नेताओं के रूप में सामने आ रहे हैं। अपनी उच्च शिक्षा का सही मुकाम ये राजनीति में देखते हैं। आखिर उच्च शिक्षा किसी को अच्छी नौकरी ही तो देती हैं। धन-संपदा और ताकत देती है। राजनीति भी इन दिनों एक तरह का सफलतम व्यवसाय है।