संसद का मानसून सत्र उतना बेकार भी नहीं रहा, जितना पहली नजर में लगता है। माना कि कानून पारित नहीं हुए, बहस सिर्फ एक दिन होने दी कांग्रेस ने, यह भी माना कि इतनी नारेबाजी शायद ही पहले दिखी होगी लोकसभा में। लेकिन इस सत्र में सप्ष्ट हुई एक अति महत्वपूर्ण बात, कि सोनिया और राहुल गांधी की नजरों में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं हैं देश के।
राहुल ने प्रधानमंत्री के बारे में बेअदबी से बात की, जैसे किसी मामूली चायवाले के बारे में बोल रहे हों। राहुल जी जब जोश में आते हैं, तो हिंदी भूलकर अंग्रेजी का सहारा लेते हैं, सो उन्होंने अंग्रेजी के 'गटलेस' शब्द का प्रयोग किया, जो बुजदिल से भी बढ़कर है। इसी अंदाज में राहुल गांधी ने विदेश मंत्री के बारे में कहा था, 'सुषमा स्वराज अपराधी हैं और अपराधियों की जगह जेल है।' अपराध क्या है, सुषमा स्वराज का, यह स्पष्ट नहीं हुआ है।
इस मानसून सत्र के दौरान राहुल ने स्पष्ट किया कि मोदी सरकार को किसी हाल में चलने नहीं देंगे। जिस दिन उन्होंने लोकसभा में मोदी को 'गटलेस' कहा, उनके एक खास समर्थक से मेरी बात हुई। उन्होंने बेझिझक राहुल की तारीफ इन शब्दों में की, भाई स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस अब राहुल की कांग्रेस बन गई है और राहुल ने ठान लिया है कि मोदी सरकार को चलने नहीं दिया जाएगा। यह उनकी रणनीति है, और क्यों न हो, आखिर राजनीति में ऐसा होता ही है।
मैंने जब विनम्रता से अर्ज किया कि असली राजनेता देश के बारे में भी सोचते हैं, और अगर संसद को चलने नहीं दिया जाता है, तो देश का नुकसान होता है। इस पर राहुल गांधी के समर्थक ने वही कहा, जो कांग्रेस प्रवक्ता कई बार कह चुके हैं, हम क्यों चलने दें संसद को, जब विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने भी यही किया था? यानी सोनिया और राहुल गांधी के लिए बदले की भावना देशभक्ति से ज्यादा अहमियत रखती है। मोदी की गलती सिर्फ इतनी है कि उन्होंने भारत के इस शाही परिवार के साथ सभ्यता से पेश आने की कोशिश की है। याद कीजिए, बराक ओबामा के लिए जब राष्ट्रपति भवन में खास भोज रखा गया था, तब मोदी ने सोनिया गांधी को उनकी पत्नी की बगल में बैठाया था। यह भी याद कीजिए कि उसके फौरन बाद दिखने लगे थे सोनिया के आक्रामक तेवर। शायद इसलिए कि मोदी की सभ्यता को सोनिया जी ने कमजोरी समझा।
ऊपर से समस्या यह भी है सोनिया जी की कि जब से वह बहू बनकर आई हैं यहां, तब से कुछ वर्षों को छोड़कर उनकी भूमिका रही है या तो प्रधानमंत्री की बहू या बीवी की या असली प्रधानमंत्री की। पिछले दस वर्षों में औपचारिक तौर पर बेशक प्रधानमंत्री निवास में वह नहीं थीं, पर दिल्ली की राजनीतिक गलियों में सब जानते थे कि असली प्रधानमंत्री निवास 10, जनपथ था, 7 रेसकोर्स नहीं। तो कैसे बर्दाश्त कर सकती हैं कि वह कि प्रधानमंत्री निवास में विराजमान है एक ऐसा व्यक्ति, जिसको उनकी नजरों में इस निवास के तोरण को छूने का भी अधिकार नहीं होना चाहिए।
सो अब एक ही लक्ष्य है राहुल और सोनिया गांधी का, कि मोदी सरकार को हर तरह से इतना परेशान रखना कि वह न परिवर्तन ला सकें, न विकास। ललित मोदी प्रकरण हाथ न लगता, तो कोई और हथियार का उपयोग होता मोदी पर वार करने के लिए। संसद का गुजरा सत्र सिर्फ ट्रेलर था, पिक्चर अभी बाकी है।