फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

मौलाना अरशद मदनी और संघ प्रमुख मोहन भागवत की मुलाकात के मायने...

अवधेश कुमार
Updated Thu, 05 Sep 2019 06:04 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
संघ प्रमुख मोहन भागवत - फोटो : अमर उजाला

जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ हुई बातचीत सामान्य घटना नहीं है। डेढ़ घंटे से ज्यादा चली इस मुलाकात के बारे में संघ ने कोई बयान नहीं दिया है, पर मदनी ने संघ प्रमुख को कहा कि इस समय मुसलमानों में भीड़ की हिंसा तथा तत्काल तीन तलाक के खिलाफ बने कानून को लेकर चिंता का माहौल है, तथा एक बड़े समुदाय में भय पैदा कर देश का विकास नहीं हो सकता। देश के भविष्य की दृष्टि से इस बैठक में हुई बातचीत का महत्व तो है ही,  इन दोनों की मुलाकात का महत्व उससे ज्यादा है।

आगे निरंतर संवाद पर दोनों नेताओं में सहमति बनी है। जो लोग सामाजिक-सांप्रदायिक एकता और शांति की कामना करते हैं, वे इस पहल से प्रसन्न होंगे। अगर वाकई दोनों पक्ष संवाद में रुचि रखते हैं तथा सांप्रदायिक सद्भाव के लिए मिलकर काम करना चाहते हैं, तो आलोचनाओं, विरोधों, उपहास, उत्तेजना से निरपेक्ष रखते हुए आगे बढ़ना होगा। संघ और मुस्लिम संगठनों के बीच पहले भी संवाद हुए हैं, पर हमेशा कुछ शक्तियों ने उन्हें विफल कर दिया। पूर्व सरसंघचालक स्व. कुपहल्ली सीतारमैया सुदर्शन की ओर से इसकी लगातार कोशिशें की गईं। वह संवाद जारी नहीं रहा। किंतु सुदर्शन की सहमति से संघ के प्रचारक इंद्रेश कुमार ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच नामक संगठन खड़ा किया, जो अपनी सीमाओं में लगातार सक्रिय है।



हालांकि इस बैठक में उस संगठन की कोई भूमिका थी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। बातचीत में निरंतरता रहेगी या नहीं, यह कहना भी कठिन है। इसके बावजूद निरंतर संवाद से एक दूसरे की गलतफहमियां दूर करने की संभावनाएं बनती हैं। अरशद मदनी ने कहा कि हमें बंद कमरों से बाहर निकलकर मिलकर काम करना चाहिए। इसका अर्थ है कि भागवत के साथ उनकी बातचीत सद्भावनापूर्ण माहौल में हुई।

विज्ञापन

संघ प्रमुख मोहन भागवत - फोटो : अमर उजाला
जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ हुई बातचीत सामान्य घटना नहीं है। डेढ़ घंटे से ज्यादा चली इस मुलाकात के बारे में संघ ने कोई बयान नहीं दिया है, पर मदनी ने संघ प्रमुख को कहा कि इस समय मुसलमानों में भीड़ की हिंसा तथा तत्काल तीन तलाक के खिलाफ बने कानून को लेकर चिंता का माहौल है, तथा एक बड़े समुदाय में भय पैदा कर देश का विकास नहीं हो सकता। देश के भविष्य की दृष्टि से इस बैठक में हुई बातचीत का महत्व तो है ही,  इन दोनों की मुलाकात का महत्व उससे ज्यादा है।

आगे निरंतर संवाद पर दोनों नेताओं में सहमति बनी है। जो लोग सामाजिक-सांप्रदायिक एकता और शांति की कामना करते हैं, वे इस पहल से प्रसन्न होंगे। अगर वाकई दोनों पक्ष संवाद में रुचि रखते हैं तथा सांप्रदायिक सद्भाव के लिए मिलकर काम करना चाहते हैं, तो आलोचनाओं, विरोधों, उपहास, उत्तेजना से निरपेक्ष रखते हुए आगे बढ़ना होगा। संघ और मुस्लिम संगठनों के बीच पहले भी संवाद हुए हैं, पर हमेशा कुछ शक्तियों ने उन्हें विफल कर दिया। पूर्व सरसंघचालक स्व. कुपहल्ली सीतारमैया सुदर्शन की ओर से इसकी लगातार कोशिशें की गईं। वह संवाद जारी नहीं रहा। किंतु सुदर्शन की सहमति से संघ के प्रचारक इंद्रेश कुमार ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच नामक संगठन खड़ा किया, जो अपनी सीमाओं में लगातार सक्रिय है।

हालांकि इस बैठक में उस संगठन की कोई भूमिका थी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। बातचीत में निरंतरता रहेगी या नहीं, यह कहना भी कठिन है। इसके बावजूद निरंतर संवाद से एक दूसरे की गलतफहमियां दूर करने की संभावनाएं बनती हैं। अरशद मदनी ने कहा कि हमें बंद कमरों से बाहर निकलकर मिलकर काम करना चाहिए। इसका अर्थ है कि भागवत के साथ उनकी बातचीत सद्भावनापूर्ण माहौल में हुई।

पिछले वर्ष भागवत ने राजधानी दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय संवाद आयोजित कर संघ के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी। उसमें भागवत ने हिंदुत्व की उदार व्याख्या पेश करते हुए संघ को उसका प्रतिनिधि बताया था। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था कि यदि हम मुसलमानों को अपने से अलग मानते हैं, तो यह हिंदुत्व होगा ही नहीं। संघ का एक समन्वयवादी चरित्र उन्होंने प्रस्तुत किया, जिसका कुछ असर हुआ है।

मदनी ने जब एक समुदाय के भय के बारे में कहा, तो भागवत ने कहा कि हम जब हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, तो उसमें मुसलमान शामिल हैं। ये ऐसी बातें हैं, जिनको जब तक विस्तारपूर्वक नहीं समझाया जाएगा, तब तक समझ में नहीं आ सकता। हालांकि मुस्लिम संगठनों को भी अपने व्यवहार से बताना होगा कि वे दूसरे मजहबों-पंथों का सम्मान करते हैं।

जो भी हो, दुनिया के सबसे बड़े हिंदू संगठन और देश के बड़े मुस्लिम संगठन के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अगर दोनों के बीच विश्वास का हल्का भी पुल बना, तो अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। अभी सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद की सुनवाई हो रही है। न्यायालय कोई भी फैसला दे दे, पर अगर दोनों पक्षों में तनाव बना रहे, तो उससे देश का भला नहीं हो सकता। लेकिन अगर दोनों पक्षों के बीच संवाद है, तो फैसले के बाद उसके अमल में लाने का वातावरण ही अलग होगा। संघ और जमीयत के बीच वार्ता की शुरुआत इस दिशा में मिसाल बने, ऐसी कामना की जा सकती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next