चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4), 2015-16 के आंकड़ों ने आधुनिक भारतीय जनसांख्यिकी में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया है। इतिहास में पहली बार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर (टीएफआर) 2.18 रह गई है, जो वैश्विक प्रतिस्थापन दर (2.30) से कम है।
विकसित देशों में, जहां उच्च स्वास्थ्य मानक के चलते बाल मृत्यु दर कम है, संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, प्रतिस्थापन दर 2.1 निर्धारित है। चूंकि एनएफएचएस-4 के लिए सर्वेक्षण वर्ष 2013-15 में किया गया था, हमने यह निर्धारित करने के लिए टीएफआर की प्रवृत्ति का अनुसरण किया कि मार्च 2019 तक भारत का टीएफआर लगभग 2.0 तक गिर गया होगा, जो विकसित देश की प्रतिस्थापन दर से और भी पीछे होगा। यह चौंकाने वाला है और आने वाले वर्षों में एनएफएचएस-5 द्वारा इसकी पुष्टि होनी चाहिए, जिसके लिए इन दिनों सर्वेक्षण चल रहे हैं।
बड़ी आबादी वाला भारत ऐसे देश के रूप में माना जाता रहा है, जिसे बड़ी जनसांख्यिकी का लाभ मिलेगा। पहले जैसे जनसंख्या वृद्धि चरम पर पहुंच चुकी थी, वैसे ही आज हमें यह जानने की जरूरत है कि हमारे युवाओं की जनसंख्या में आज गिरावट आ रही है। जनसंख्या वृद्धि का चरम दौर बीत चुका है। वर्तमान आबादी को बदलने के लिए भारत में पर्याप्त बच्चों का जन्म नहीं होने वाला। एनएफएचएस-4 के जनसंख्या पिरामिड को देखें, तो पता चलता है कि पिछले दस वर्षों में बहुत कम बच्चे जन्मे हैं।
भारतीय इतिहास में पहली बार जनसंख्या पिरामिड उलट गया है। गिरावट की यह दर आने वाले वर्षों में और तेज होने की ही आशंका है। इसका मतलब यह नहीं कि देश की जनसंख्या तेजी से घटेगी, क्योंकि स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार से दीर्घायु में सुधार हुआ, जो कि 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की बढ़ती आबादी से दिख रहा है।
पंद्रह वर्ष से कम उम्र के बच्चों का प्रतिशत एनएफएचएस-3 के 35 फीसदी से घटकर एनएफएचएस-4 में 29 फीसदी रह गया है। इसके विपरीत साठ वर्ष और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी एनएफएचएस-3 के नौ फीसदी से बढ़कर एनएफएचएस-4 में 10 फीसदी तक पहुंच गई है। भारत अब बुजुर्ग लोगों का देश होने के कगार पर है, जहां हम अगले कुछ दशकों में देश की औसत आयु बढ़ने की उम्मीद कर सकते हैं।