अन्य प्राकृतिक आपदाओं की तरह भूकंप से संबंधित आपदा से निपटने के भी दो पहलू हैं। एक, आपदा से पहले की तैयारी और दूसरा, आपदा आने के बाद लोगों को राहत पहुंचाना और उन्हें भविष्य में फिर से खड़े होने योग्य बनाना। मगर अन्य प्राकृतिक आपदाओं से भूकंप इसलिए अलग है, क्योंकि इससे संबंधित चेतावनी पूर्व में नहीं दी जा सकती और इससे कुछ ही क्षणों में भारी तबाही हो जाती है। इसलिए इस आपदा का निराकरण और दुरूह हो जाता है। यहां ऐसा लग सकता है कि भूकंप मानव जान की दुश्मन है, मगर हकीकत में ऐसा नहीं। यह कहावत गलत नहीं कि हमें भूकंप नहीं मारता है, बिल्डिंग-भवन मारते हैं। हमें समझना होगा कि भूकंप आने स्वाभाविक हैं। इसे रोका नहीं जा सकता, इसलिए भलाई यही है कि उससे लड़ने के लिए हम खुद को मजबूत बनाएं।
दरअसल, हमने आपदा आने के बाद की तैयारी काफी कर ली है। जैसे कि एनडीआरएफ (राष्ट्रीय आपदा मोचन बल) की मजबूत टीम हमारे पास है, जो पड़ोसी देशों तक को मदद पहुंचाने में सक्षम है। मगर आपदा आने से पहले की तैयारी पर हमें अब भी काफी काम करना होगा। भूकंप आने के बाद नेपाल में जान-माल के व्यापक नुकसान की वजह शायद यही है कि वहां भी अन्य विकासशील देशों की तरह आपदा-पूर्व प्रबंधन पर ज्यादा काम नहीं हुआ है। चूंकि वह हिमालय का क्षेत्र है, इसलिए वहां भूकंप के झटके आएंगे ही। ऐसे में, भूकंप से लड़ने की तैयारी महत्वपूर्ण होती है, जिस पर काफी काम किया जाना बाकी है।
भारत में भी आपदा-पूर्व प्रबंधन के मोर्चे पर संजीदगी से काम किया जाना शेष है। इसे दिल्ली के उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। दरअसल, दिल्ली में अनाधिकृत कॉलोनियां भी हैं और बहुमंजिली इमारतें भी। लेकिन यहां कितने भूकंप-रोधी मकान बने हैं, इसका ठोस आंकड़ा शायद ही हमारे पास है। चूंकि दिल्ली भूकंप के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में गिनी जाती है, इसलिए बेतरतीब हो रहे निर्माण कार्य यहां नुकसान पहुंचा सकते हैं।
हमें समझना होगा कि भूकंप-रोधी मकान के लिए मकान का एक यूनिट के रूप में बनना जरूरी है। यानी वह ऐसा ढांचा हो, जिसमें लचक हो। यह कुछ-कुछ मानव शरीर जैसा है, जो लचक होने की वजह से ही धक्के आदि को सहता है। मकान में यह लचक तभी आती है, जब बिल्डिंग कोड का हम पालन करें। लचक इसलिए भी जरूरी है कि भूकंप के समय बहुमंजिली इमारतों में भूतल की तुलना में ऊपरी मंजिलें में ज्यादा हलचल होती है। इसलिए उस इमारत को ऐसा जरूर बनाना चाहिए कि धरती के दो या तीन डिग्री घूमने पर भी उसे नुकसान न हो। यह बिल्डिंग कोड राष्ट्रीय आपदा मोचन बल और नागरिक सुरक्षा की वेबसाइट पर मौजूद है। सरकारी एजेंसी तो इसे लागू करती हैं, मगर दिक्कत यह है कि निजी तौर पर होने वाले निर्माण कार्यों में इस पर अमूमन कम ही ध्यान दिया जाता है।
बिल्डिंग कोड असल में, हर जोन के हिसाब से अलग-अलग तय किए गए हैं। यह भूकंप की तीव्रता के अनुसार बनाया गया है। मसलन, सबसे ज्यादा खतरे वाले जोन-पांच (हिमालयी क्षेत्र, पूर्वोत्तर क्षेत्र और कच्छ) में भवन बनाने के मानक अलग हैं, क्योंकि वहां ज्यादा खतरा है, जबकि जोन- चार (दिल्ली और उत्तर भारत का तराई क्षेत्र) का अलग। इसी तरह, जोन-तीन (मध्य भारत) और जोन-दो (दक्षिण भारत) में भी भूकंप की तीव्रता के अनुसार भवन बनाने के अलग-अलग मानक तय किए गए हैं। अगर इन मानकों के हिसाब से निर्माण-कार्य हों, तो जान-माल का नुकसान काफी कम किया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त भी कुछ अन्य प्रयास किए जाने की जरूरत है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है, माइक्रोजोनिंग का कार्य। माइक्रोजोनिंग का अर्थ है, क्षेत्रवार जमीन की संरचना के हिसाब से जोनों के भीतर भी भूकंप के खतरों के अनुसार जोन बनाना। दिल्ली, गुवाहाटी, कोलकाता और बंगलूरू जैसे शहरों में यह काम हो चुका है। यह पूरे देश में किए जाने की जरूरत है। माइक्रोजोनिंग का महत्व इसलिए है, क्योंकि एक ही शहर में भूकंप की ताकत के हिसाब से मिट्टी का व्यवहार अलग-अलग होता है। जैसे दिल्ली में ही राष्ट्रपति भवन में भूकंप की जो ताकत होगी, वह इंडिया गेट पर बिल्कुल अलग हो सकती है, क्योंकि राष्ट्रपति भवन पत्थरों पर खड़ा है, जबकि इंडिया गेट के नीचे मिट्टी भी है। इसलिए जरूरी है कि 100-100 मीटर की दूरी के हिसाब से जोनिंग का कार्य हो, और उसी आधार पर आपदा-पूर्व प्रबंधन को ठोस बनाया जाए।
इसी तरह, लोगों में जागरूकता फैलाकर भी व्यापक नुकसान से बचा जा सकता है। यह अच्छी बात है कि लोगों ने अब भूकंप से बचाव को लेकर सोचना शुरू कर दिया है। इमारतें तो कमोबेश भूकंप-रोधी ही बनने लगी हैं। फिर भी कई जगहों पर बिल्डिंग कोड का पालन नहीं होता। ऐसा वहां भी हो रहा है, जो भूकंप के हिसाब से संवेदनशील माने गए हैं। दिक्कत यह भी है कि भवनों के निर्माण में हम भू-तकनीक के जानकारों की मदद नहीं लेते। लिहाजा कुछ लोगों का यह मानना, कि शहरीकरण ने ही भूकंप की मारकता बढ़ाई है, गलत है। समस्या बढ़ रहा शहरीकरण नहीं, बल्कि उन मानकों का पालन नहीं करना है, जो भूकंप जैसी आपदाओं से लड़ने के लिए तय किए गए हैं। हम आपदा के बाद की स्थिति से लड़ने की तो सोच रह रहे हैं, उस पर काम भी हुआ है, पर सवाल यह है कि आपदा-पूर्व की हमारी तैयारी कितनी है। इसके जवाब के लिए हमें खुद को ही टटोलना होगा।
-भारतीय मौसम विज्ञान विभाग में भूकंप विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख