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ग्राम विकास की आड़ में उद्योगों की बाढ़

Fri, 25 Jul 2014 07:35 PM IST
अनिल जोशी
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हमने सारी ही बातें पश्चिम से सीखी हैं, चाहे वह संविधान की बात हो या विकास का मॉडल। यही कारण है कि कृषि प्रधान देश में उद्योगों को विकास का सबसे बड़ा वाहक मानकर हम इसके प्रति लगभग अंधे हो गए। खेती-बाड़ी को आवश्यकता तक सीमित कर विलासिता के लिए उद्योगों की होड़ में जुट गए। यह बात नकारी नहीं जा सकती कि उद्योगों का अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है, पर उद्योग ही सब कुछ है, ऐसा नहीं माना जा सकता।
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स्वतंत्रता के करीब सड़सठ साल बाद भी अपने देश का खाका लगभग वैसा ही है, जिसमें बड़ा हिस्सा गांवों का है। इनका योगदान आज के विकास में गौण समझा जाता है, क्योंकि ये मात्र अन्न-पानी ही दे सकते हैं, जबकि उद्योगों से वह सब मिलता है, जो आज की पीढ़ी की प्राथमिकता में है। गांव इसलिए पिछड़े हैं, क्योंकि वहां विलासिता की सुविधाएं न के बराबर हैं। इसीलिए नीतिकारों की दृष्टि में गांवों के विकास की परिभाषा नए सिरे से तय की जा रही है। यह सब तय करने वाले लोग भी शहरी सभ्यता के ही समर्थक हैं।

विकास के हमारे आंकड़े छलावे से ज्यादा कुछ नहीं हैं। यह ठीक है कि देश में औसत आय बढ़ी है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा तो संपन्नों का ही है। दरअसल हमारा विकास एकतरफा है, और इसका लाभ भी मुट्ठी भर लोगों को ही मिल रहा है। यह सब उद्योगों की ही कृपा है कि शहरी आय तेजी से बढ़ी है। विकास की इसी कड़ी में सरकारें अब गांवों में भी भारी उद्योग लगाकर आर्थिक क्रांति का संदेश देना चाहती हैं। बड़े उद्योगों के दावे ग्रामीण विकास और स्थानीय रोजगारों के सृजन के लिए किए जाते हैं। जबकि सच कुछ और ही होता है। विकास के नाम पर कई बड़ी योजनाएं गांवों की संस्कृति व संसाधनों का नाश कर चुकी हैं। ये योजनाएं रोजगार और उद्योगों के नाम पर लोगों को उनके खेत-घर से तो बाहर ले ही जाती हैं, उनकी जीवन शैली पर भी बड़ी चोट करती हैं। पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी कई बड़े उद्योगों का विरोध हुआ है। ये विरोध जायज हैं। क्या विडंबना है कि जिस पृथ्वी को बनने में करोड़ों वर्ष लगे, उसकी शक्ल को हम उसके एक प्रतिशत से भी कम समय में खत्म करते जा रहे हैं।
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ऐसे में सभी बड़ी योजनाओं और उद्योगों की समीक्षा का समय अब आ चुका है, क्योंकि उद्योगों से उत्पन्न पर्यावरणीय प्रश्न हमेशा ही अनुत्तरित रहते हैं। ऐसी पहल कभी सरकार की ओर से नहीं होगी। अब समय आ चुका है कि इन बड़ी योजनाओं व उद्योगों में आम आदमी की भागीदारी व सहमति सुनिश्चित की जाए। जब सरकार सब कुछ जनहित में करने का दावा करती है, तो ऐसी किसी भी विवादित योजना पर सहमति से पहले सहभागिता क्यों न जुटाई जाए?

बड़ी योजनाओं में आम सहमति के ज्यादा फायदे सरकार को ही होंगे। ऐसे में, विवादों से बचकर सरकार अपनी छवि बेहतर कर सकती है, क्योंकि सरकारों के प्रति आम आदमी के मन में अब निराशा से ज्यादा कुछ नहीं। लोगों की सहभागिता से स्थानीय अनुभवों का सीधा लाभ तो पहुंचेगा ही, अन्य कई योजनाएं भी अपना स्थान बना पाएंगी। सरकार को अगर योजनाओं के प्रति जनमत तैयार करना पेचीदा काम लगता हो, तो सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करती हुई एक समिति का गठन किया जा सकता है। इस तरह सरकारें न सिर्फ लोगों के बीच भरोसा बना पाएंगी, बल्कि इससे विकास भी एकांगी नहीं रहेगा।
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(लेखक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
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