कृषि विधेयक किसानों को उस निर्णायक मोड़ पर स्वतंत्रता प्रदान कर रहे हैं, जब कृषि क्षेत्र में सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) की संरचना तेजी से बदल रही है। फसलें, विशेष रूप से अनाज का इस क्षेत्र में वर्चस्व था और उसके भंडारण, वितरण एवं आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए कई तरह के नियंत्रण थे। अनाजों के क्षेत्र में किसानों को मांग और आपूर्ति के झटके से बचाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) एक तंत्र के रूप में विकसित हुआ। अब हालांकि किसानों एवं कृषि उत्पादकों ने अपने उत्पादों में विविधता लाई है, अनाजों का वर्चस्व नहीं रह गया है और नियंत्रण के पुराने तंत्रों का भी अब प्रभाव नहीं है। किसानों को सीधे बाजार और उपभोक्ताओं से जोड़ने से किसानों की आय 20 से तीस फीसदी बढ़ रही है, जैसा कि पिछले पांच-सात वर्षों में मूल्य प्रस्ताव को मान्यता देने वाले 600 से अधिक एग्री-टेक कंपनियों ने प्रदर्शित किया है। इन रुझानों के मूल्य को कम करने के लिए एक अग्रगामी नीतिगत माहौल की आवश्यकता होती है, जिसे लागू करने के लिहाज से कृषि बिल महत्वपूर्ण हैं।
पिछले दशक में ही, भारत ने कृषि क्षेत्र की जीवीए संरचना में जबर्दस्त बदलाव देखा है। फसलों की हिस्सेदारी वर्ष 2011-12 के 65.4 फीसदी से घटकर वर्ष 2018-19 में 55.3 फीसदी रह गई और जिसके वर्ष 2024-25 में 45.6 फीसदी तक गिर जाने का अनुमान है। फसलों में मात्र अनाज को एमएसपी का समर्थन मिलता है। इसी अवधि में, पशुधन और मत्स्यपालन के मूल्य में लगातार वृद्धि हो रही है, क्योंकि ये बागवानी, दूध और मांस जैसे उप-खंडों के कुल मूल्य उत्पादन हैं। विविधतापूर्ण उत्पादन रणनीति के साथ, जो अनाज पर कम और अन्य क्षेत्रों पर ज्यादा निर्भर है, किसान बेहतर आय प्राप्त कर रहे हैं। अपनी उपज में विविधता लाकर वे एक-फसल के जोखिम से बच रहे हैं।
किसानों को अधिक स्वतंत्र बनाने और उनकी आय क्षमता में सुधार के लिए हाल ही में तीन विधेयक पारित किए गए हैं- किसानों के उत्पाद का व्यापार और वाणिज्य विधेयक; मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा पर कृषक समझौता विधेयक; और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक। ये विधेयक किसानों को अपनी फसल और उत्पादन में विविधता लाने की स्वतंत्रता देते हैं। वे अब अपनी फसल देश में कहीं भी ज्यादा मूल्य देने वाले को बेच सकते हैं; उन्हें अब मंडी में जाने की जरूरत नहीं है, जहां वे बिचौलियों और विभिन्न स्तरीय नौकरशाही के अधीन होते हैं। किसानों के लिए अनुबंध खेती अब एक ऐसे फ्रेमवर्क के साथ खोली गई है, जो उन्हें खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों द्वारा अनुबंध और सुनिश्चित खरीद के जरिये अपने उत्पादों के मूल्यवर्धन में सक्षम बनाता है। एमएसपी को बनाए रखने का मतलब है कि सरकार कुछ फसलों के लिए पूरे नेटवर्क की जिम्मेदारी ले रही है, ताकि किसानों को उन फसलों का सुनिश्चित मूल्य मिल सके। केंद्र सरकार ने सितंबर के अंतिम हफ्ते में एमएसपी पर 1,082 करोड़ रुपये के 5.73 लाख टन धान की खरीदारी की।
किसानों की आजीविका में सुधार के लिए कृषि प्रणाली में संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता थी। उन्हें सब्सिडी पर निर्भर रखना, एपीएमसी द्वारा प्रतिबंधित करना तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे कानून दीर्घकालीन अर्थों में देशहित में नहीं था। इसे स्वीकार करते हुए मोदी सरकार प्रणाली में क्रमिक बदलाव ला रही है। कृषि उपज के ऑनलाइन व्यापार सुविधा के लिए राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम) के साथ इसकी शुरुआत हुई। फिर नौ करोड़ सीमांत किसानों को वार्षिक 6,000 रुपये की न्यूनतम आय सहायता प्रदान करने के लिए पीएम-किसान योजना पेश की गई। इन लाभार्थियों को एमएसपी का लाभ नहीं मिलता है, जो केवल छह फीसदी किसानों पर लागू होता है, मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि क्षेत्रों में।
पिछले चार महीनों में किसानों की सहायता के लिए कई योजनाएं लाई गई हैं और बदलाव किया गया है। फसल सीजन के दौरान बड़े कार्यबल और उपकरणों को बनाए रखने के लिए कुल दो लाख करोड़ रुपये के ऋण आवंटन के साथ किसान क्रेडिट कार्ड किसानों की योजना को बेहतर बनाने में मदद कर रहा है, जिससे उत्पादन और आय में वृद्धि हुई है। यह किसानों को आधार से जुड़े औपचारिक क्रेडिट इतिहास का निर्माण करने में सक्षम बनाता है, जिसे कृषि विस्तार और विविधतापूर्ण रणनीतियों के लिए ऋण प्राप्त करने के लिए भुनाया जा सकता है।
आत्मनिर्भर भारत अभियान के हिस्से के रूप में एक लाख करोड़ रुपये के कृषि बुनियादी ढांचा कोष की घोषणा की गई है, इसका मुख्य फोकस फार्म-गेट, भंडारण स्थल, कृषि उद्यमी, रोग नियंत्रण, शीतगृह व गोदाम और कलस्टर आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से माइक्रो फूड उपक्रम तैयार करने पर रहेगा। उप-खंडों के विकास में महत्वपूर्ण अंतरों को पहचानते हुए, आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में लंबे समय से प्रतीक्षित संशोधनों के साथ मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी जैसे विभिन्न उप-खंडों के लिए लक्षित कार्यक्रम भी शुरू किए गए। कृषि उद्योगों के लिए इन क्रमिक ढांचे के निर्माण का समर्थन करते हुए ये तीनों विधेयक किसानों को खेती करने और उनमें विविधता लाने में सक्षम बनाते हैं। इन विधेयकों के भारी विरोध ने राजनीतिक एवं निहित स्वार्थों को उजागर किया है। इस बीच, केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि इन बिलों को लागू करने के दौरान किसानों को मिलने वाली विभिन्न सब्सिडी जारी रहेगी, इस प्रकार किसानों को मूल्यवान सहायता प्रदान की जाएगी और राहत की निरंतरता सुनिश्चित की जाएगी, ताकि किसान नई रणनीति को अपना सकें। समय के साथ, यह स्वतंत्रता-समर्थन मॉडल किसानों की आय में वृद्धि करेगा और भारत की जीडीपी में कृषि क्षेत्र के मौजूदा 17 फीसदी योगदान में वृद्धि करेगा।
यह भारत को अपने कृषि क्षेत्र को निर्यात बाजारों की ओर उन्मुख करने का बहुप्रतीक्षित अवसर भी देता है। भारत ग्रेडिंग, छंटाई और आपूर्ति शृंखला वितरण के लिए बुनियादी ढांचा प्रदान करके आसानी से मौजूदा निर्यात को तीन गुना तक बढ़ा सकता है, जो इन विधेयकों द्वारा दी गई स्वतंत्रता के कारण संभव है। देश और किसानों के पास 70 साल के ठहराव से बाहर निकलने और बड़ा लक्ष्य हासिल करने का एक पीढ़ीगत अवसर है।
(मोहनदास पई एरियन कैपिटल पार्टनर्स के चेयरमैन और निशा होला सी-कैम्प की टेक्नोलॉजी फेलो हैं।)