पिछले मंगलवार को अचानक संसद भवन के बाहर माहौल में हलचल दिखी, जबकि मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के लिए चार नोटिस दिए जाने के बावजूद दो हफ्ते से ज्यादा समय तक संसद में कामकाज ठप रहा था। मंगलवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दिल्ली आने के कारण उत्साह था। सदन के भीतर सबकी निगाहें उन्हीं पर टिकी थीं, जब वह केंद्रीय हॉल में कॉफी और टोस्ट का आनंद ले रही थीं और सबसे पहले कुछ मिनट तक रविशंकर प्रसाद से बातें करते दिखीं। और फिर वह उस दिन की बड़ी बैठक के लिए चली गईं, वह शरद पवार से उनके कार्यालय में मिलने गईं, जाहिर है, वह विपक्षी एकता की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए गई थीं। वह विपक्ष के अन्य कई नेताओं से भी मिलीं और बताया गया कि वह सोनिया गांधी से भी मिलेंगी, जो अभी स्वस्थ नहीं हैं।
ऐसा नहीं है कि विपक्षी नेताओं ने एक संयुक्त मोर्चा बना लिया है और 2019 में मोदी के खिलाफ अपना साझा नेता घोषित कर दिया है। विपक्षी दलों का एक साथ आना ही उनके प्रभावी होने का एकमात्र तरीका है, यह देखते हुए कि जब 2014 में मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी, भाजपा को मात्र 31 फीसदी लोकप्रिय वोट मिले थे, जबकि बाकी के 69 फीसदी वोट बिखरे हुए थे। इस उत्साह ने तब जोर पकड़ा, जब यह चर्चा बढ़ गई कि भाजपा अब अजेय नहीं है। और इसलिए विपक्ष द्वारा साथ आने की दिशा में कोई भी छोटी या बड़ी नई पहल वर्तमान संदर्भ में एक नया अर्थ प्राप्त करती है, जैसे ममता का शरद पवार और अन्य विपक्षी नेताओं के साथ विचार विमर्श करना। इसके अलावा ममता और के. चंद्रशेखर राव ने संघीय मोर्चे पर विचार विमर्श किया या यहां तक कि प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष ने हस्ताक्षर अभियान चलाया, जिसने उन्हें संयुक्त पहल करने में सक्षम बनाया। इसका सामान्य कारण यह है कि विपक्ष के लिए मैदान खुला हुआ है। सपा और बसपा के साथ आने से उत्तर प्रदेश और उससे बाहर की राजनीति में एक नया मोड़ आया है।
उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में भाजपा की हार क्या केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है? इसमें कोई शक नहीं है और भाजपा के पिछले चार वर्षों के रिकॉर्ड तथा उसकी जोड़ी नंबर एक द्वारा प्रदर्शित अथक ऊर्जा को देखते हुए कहा जा सकता है कि सही जगह बनाने के लिए भाजपा सभी अवरोधों को उखाड़ फेंकेगी। फिर भी गोरखपुर और फूलपुर का नतीजा इस बात का सबूत है कि जब विपक्षी दल हाथ मिलाते हैं, तो क्या हो सकता है। 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनावों से पहले के महीनों में भाजपा विपक्ष के एकजुट होने की स्थिति में अलग-थलग पड़ने को लेकर भी आशंकित थी।
अब जबकि विपक्षी नेताओं के बीच बैठकों की शुरुआत हो चुकी है, वे एक माहौल बना सकते हैं। पर चुनाव से पहले भाजपा विरोधी पार्टियों को एकजुट करने की बात कहना करने की तुलना में आसान है। केसीआर ममता बनर्जी के साथ हाथ मिला सकते हैं, लेकिन उनके इस गठजोड़ से एक दूसरे के राज्यों में वह कोई फायदा नहीं पहुंचा सकते। तेलंगाना में ममता का कोई प्रभाव नहीं है और न ही केसीआर का पश्चिम बंगाल में। दूसरी तरफ, सवाल यह है कि क्या ममता पश्चिम बंगाल में कांग्रेस या वाम दल के साथ हाथ मिला सकती हैं। इसकी संभावना नहीं है। अगर यह मान लें कि ऐसा संभव हो सकता है, तो फिर बंगाल में विपक्ष का मैदान भाजपा के लिए खुला होगा और भगवा ताकत पर रोक लगाने के लिहाज से यह अच्छी रणनीति नहीं होगी।
तीन बड़े राज्य ऐसे हैं, जहां चुनाव से पहले विपक्षी एकता का असर पड़ेगा-उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र। अगर लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा के बीच गठबंधन होता है, तो यह भाजपा के लिए एक बड़ा झटका होगा। बिहार में अगर कांग्रेस राजद के साथ गठबंधन करती है, तो नीतीश कुमार के भाजपा के लिए महागठबंधन तोड़ने के बावजूद भाजपा के लिए वहां मुश्किल पैदा होगी। विडंबना यह है कि लालू के जेल जाने के बाद उनके प्रति सहानुभूति दिख रही है और अररिया उपचुनाव के नतीजे में यह दिखा भी। और अगर राकांपा तथा कांग्रेस ने महाराष्ट्र में हाथ मिला लिया, तो यह भाजपा के लिए फिर एक कठिन संघर्ष होगा। इसलिए आश्चर्यजनक नहीं है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा शिवसेना को लुभाने में लगी हुई है।
ये तीन राज्य अकेले भाजपा को बहुमत से नीचे ला सकते हैं, भले ही भाजपा इसकी भरपाई पूर्वी और पूर्वोत्तर के राज्यों में कर ले। फिर राजस्थान और मध्य प्रदेश है, जहां कांग्रेस के लिए फायदा उठाना आसान है। कर्नाटक भी अचानक महत्वपूर्ण हो उठा है, वहां चाहे किसी की भी जीत या हार हो, उम्मीद है कि इससे लोकसभा चुनाव की लड़ाई को गति मिलेगी। इसके अलावा, उत्तर भारतीय राज्यों के खिलाफ दक्षिणी राज्यों का नजरिया भी 2019 में मतदाताओं के विकल्प को प्रभावित कर सकता है। दक्षिणी राज्यों में इस बात को लेकर नाराजगी बढ़ रही है कि उन्हें बीमारू राज्यों का बोझ उठाना पड़ रहा है।
अंत में 2019 में विपक्षी दलों की संभावनाओं पर क्या फर्क पड़ेगा, यह कहना मुश्किल है, क्योंकि चुनाव से पहले व्यापक विपक्षी मोर्चा नहीं है, और मौजूदा विरोधाभासों के चलते यह कठिन है। इसके साथ विपक्षी मोर्चे के नेता के नाम पर आम सहमति बनाना भी मुश्किल होगा, क्योंकि दावेदार कई हैं। काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस कितनी सीटें जीत पाती है। सभी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में विपक्षी वोटों को बंटने से रोकना सबसे महत्वपूर्ण होगा। यह श्रमसाध्य कार्य होगा, जिसे दो शरद कर सकते हैं-शरद पवार और शरद यादव। तमाम संभावनाओं में हम 2019 में 1996 के जैसे परिदृश्य की संभावना के बारे में सोच सकते हैं, जब चुनाव के बाद क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस की मदद से संयुक्त मोर्चा सरकार का गठन किया था। लेकिन फिलहाल मैदान सबके लिए खुला हुआ है।