अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2015 में 7.3 प्रतिशत विकास दर के साथ भारत दुनिया के उभरते देशों में सबसे तेज विकास दर वाला देश बन गया है। रिपोर्ट कहती है कि यदि भारत कारोबार और आर्थिक सुधारों पर तेजी से आगे बढ़ेगा, तो 2020 में 7.7 फीसदी विकास दर के साथ विकसित देशों के बीच शीर्ष पर रह सकता है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट, 2015 के अनुसार, सुस्त पड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था में नई आर्थिक संभावनाओं के मद्देनजर भारत पहले क्रम पर है। रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में दुनिया की सबसे प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं में भारत ने 16 पायदान की छलांग लगाई है। इसकी रैंकिंग 71वीं से बढ़कर 55वीं हो गई है। बेहतर आर्थिक हालात और इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार के कारण फोरम ने भारत की रैकिंग बेहतर की है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने के मामले में भारत ने चीन और अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। 2015 की पहली छमाही में भारत ने 31 अरब डॉलर का विदेशी पूंजी निवेश आकर्षित किया।
वैश्विक आर्थिक शोध संगठन डेनियल अल्टमैन्स बेसलाइन प्रॉफिटेबिलिटी इंडेक्स की रिपोर्ट, 2015 के अनुसार भी आर्थिक विकास तथा विदेशी निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक ठिकानों की सूची में भारत शीर्ष पर है। भ्रष्टाचार में कमी और अपने मुनाफे को वापस अपने देश में ले जाने की आजादी जैसे कई मानदंडों के आधार पर इस सूचकांक में भारत आगे है। अंकटाड की रिपोर्ट भी एफडीआई के मोर्चे पर भारत की प्रगति के बारे में बताती है।
वर्ष 2000-01 में यहां एफडीआई चार अरब डॉलर था, जो 2005-06 में दोगुना बढ़कर 8.9 अरब डॉलर हो गया। वर्ष 2008-09 में यह 42 अरब डॉलर हो गया। वर्ष 2014-15 यह आंकड़ा बढ़कर 45 अरब डॉलर हो गया, जबकि 2015-16 में इसके 60 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की संभावना है। उभरते बाजारों में बड़े निवेश योग्य विकल्पों की कमी के बीच भारत में आर्थिक अनुकूलता अधिक है। फिर चीन अब विनिर्माण की ऊंचाई के बाद सेवा क्षेत्र की ओर रुख कर रहा है, जहां अधिक विदेशी निवेश की जरूरत नहीं है।
आर्थिक मोर्चे पर चमकीली तस्वीर के बावजूद अपने यहां विभिन्न सुधारों की दिशा में काफी काम करने की जरूरत है। जैसे, नए उपक्रमों को स्थापित करने में प्रक्रियागत समस्याओं के अलावा जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास कानूनों के चलते बनी बाधाओं को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। देश में आर्थिक सुधारों की गति धीमी है। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और जीएसटी के मोर्चे पर सरकार को सफलता नहीं मिली। सब्सिडी के बोझ को कम करने की दिशा में कदम नहीं उठे हैं। बैकों के एनपीए चिंताजनक संकेत दे रहे हैं। वर्ष 2015-16 के केंद्रीय बजट में अनुमानित विनिवेश से 69 हजार करोड़ रुपये की प्राप्ति लक्ष्य से बहुत दूर है। अधिकांश श्रम सुधार कानून सरकार की स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इस समय पूरी दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था की विश्वसनीयता जिस तरह आंशिक तौर पर बहाल हुई है, उसे अगले कुछ वर्षों तक बरकरार रखने की जरूरत है। सरकार अगर तमाम आर्थिक सुधारों को जमीनी स्तर पर लागू किए जाने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ेगी, तभी आर्थिक विकास की चमकीली संभावनाओं के सपने साकार होंगे।