अपनी सुंदरता, अपनी समृद्धि, अपने संपर्क-हैसियत या अपनी किसी खूबी का दिखावा करते हुए अहंकार प्रदर्शन के लिए सेल्फी लेना और फिर उसे सोशल मीडिया के जरिये दुनिया भर में पहुंचाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। मोबाइल कैमरे से ली जाने वाली खुद की तस्वीर यानी सेल्फी के ज्यादातर पक्ष नकारात्मक हैं। कई दुर्घटनाएं भी इस बीच सेल्फी लेने के प्रयास में हो चुकी हैं, जैसे हाल में मुंबई के समुद्र तट पर सैर-सपाटे को आई तीन लड़कियों में से एक की मौत सेल्फी लेने के कारण हो गई। ये लड़कियां सेल्फी लेते समय खुद को संभाल नहीं पाईं और समुद्र में बह गईं।
सेल्फी लेते समय हुई दुर्घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है। युवाओं में सेल्फी लेने का शौक इतना अधिक है कि शायद ही कोई हफ्ता गुजरता हो, जब इस कारण किसी दुर्घटना की खबर न आती हो। पर क्या इन्हें सिर्फ दुर्घटना माना जाए या ये दुर्घटनाएं आत्ममुग्धता की एक ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति के उभरने का संकेत है, जिसे सामाजिक समस्या मानने और उसके इलाज की जरूरत है?
दुनिया में जब से मोबाइल क्रांति हुई है और जब से सोशल मीडिया के तौर-तरीके अस्तित्व में आए हैं, लोगों में दिखावे की यह प्रवृत्ति आसमान पर पहुंच गई है। पहले भी आत्ममुग्ध लोग अपनी सुंदरता, समृद्धि या फिर अपनी किसी अन्य विशेषता का प्रदर्शन करने को बेताब रहते थे। पर उसके तौर-तरीके थोड़े अलग, कठिन और महंगे थे। मगर सामने के कैमरे से खुद की फोटो खींचने की सुविधा देने वाले स्मार्टफोनों के आने के बाद तो जैसे हर कोई बिना किसी औचित्य के ही फोटो खींचना और सोशल मीडिया पर डालना जरूरी मानने लगा है। लोगों की दिखावा करने की आदत सेल्फी के चलन के बाद सनक में बदल गई है।
किशोर और युवा लड़के-लड़कियों में स्टंट सेल्फी का ट्रेंड है, तो महिलाएं भी सेल्फी के इस अतिवाद में फंसी हुई हैं। ऐसा करते समय कई बार वे जरूरी सावधानियां नहीं बरततीं और सामान्य शिष्टाचार व शालीनता का ध्यान नहीं रख पाती हैं। विडंबना यह भी है कि आज जिस समाज में एक व्यक्ति अपने पड़ोसी को ही नहीं जानता-पहचानता, वह सेल्फी के जरिये पूरी दुनिया की तारीफ ‘लाइक्स’ के रूप में पाना चाहता है। पर यह मामला सिर्फ झूठी तारीफ पाने या दिखावे का डिजिटल प्रबंध करने का ही नहीं है, बल्कि लोग चाहते हैं कि सोशल मीडिया पर डाली गई सेल्फी आगे बढ़ाई जाए, दूसरे लोग उसे साझा करें और झूठ में ही सही, उसकी तारीफ करें।
समाजशास्त्रियों के मुताबिक, सेल्फियों और ट्विटर-फेसबुक के जरिये सतत संपर्क में रहने की सुविधा ने लोगों को आवेगपूर्ण जीवन में धकेल दिया है, जहां मानसिक शांति की कोई जगह नहीं है। वे कहते हैं कि आज सोशल मीडिया का पोस्ट बॉक्स हमारे साथ हमेशा चलता है, जिसने कोई बात कहने, थोड़े इंतजार के बाद उसके कहीं पहुंचने से मिलने वाले आनंद को खत्म कर दिया है। फेसबुक कमेंट और सेल्फियां कुछ सुकून पैदा करती हों या नहीं, पर वे एक तरह की असुरक्षा की तरफ जरूर ले जाती हैं, जिसमें कुछ नया जानने और बताने की इच्छा खतरनाक आवेग की तरह हावी रहती है। इसलिए अच्छा यही होगा कि अब इसके सर्जनात्मक पहलुओं की ओर ध्यान दिया जाए और वैसा ही उपयोग खोजा जाए, जैसे कि हरियाणा की एक पंचायत ने ‘सेल्फी विद डॉटर’ नामक अभियान के रूप में पिछले साल खोजा था।